Monday, 8 July 2019

पुकारे गी इक दिन ज़िन्दगी मुझे

ऊँचे नीचे  पथरीले रास्तों पर
डगमगाती ज़िन्दगी
राह अंजान पथ है सूना
चला जा रहा हूं ज़िंदगी में अकेला
न साथी न कोई सहारा मेरा
लेकिन मुझे है यक़ीन
देगी आवाज ज़िंदगी मुझे
बाहें फैलाये किसी खूबसूरत मोड़ पर
पुकारे गी इक दिन ज़िन्दगी मुझे

रेखा जोशी

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (09-08-2019) को "रिसता नासूर" (चर्चा अंक- 3422) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सादर आभार आपका आदरणीय शास्त्री जी

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