Monday, 4 May 2015

है आकुल मन विकल ह्रदय शरण भगवन मै अब आया

कुरुक्षेत्र में जीवन के बन अर्जुन मै अब  आया
है आकुल मन विकल ह्रदय शरण भगवन मै अब आया
…
भ्रष्टाचार की है तौबा बढ़े है पेट लालों के
भाई  बँधु  है सब अपने डूबे जो घोटालों  में
खाते  है छीन चारा मुख से अपने भाइयों के
चढ़ा प्रतंचया फिर से ले  गांडीव मै अब आया
है आकुल मन विकल ह्रदय शरण भगवन मै अब आया
…
पूछो न पाखंडों की ,भरे  आश्रम है बाबों से 
दिखा कर चमत्कार झूठे  लूटे वो मासूमों को
करें खिलवाड़ उम्मीदों का ,आहत कर गरीबों को
चढ़ा प्रतंचया फिर से ले  गांडीव मै अब आया
है आकुल मन विकल ह्रदय शरण भगवन मै अब आया
…
 लाज अपनी बचाने को पुकारे आज पांचाली
भरे बाज़ार लुटती है यहाँ पर आज है नारी
करो इन्साफ हे भगवन शरण अब आई दुखियारी
चढ़ा प्रतंचया फिर से ले गाँडीव मै अब आया
है आकुल मन विकल ह्रदय शरण भगवन मै अब आया
…

कुरुक्षेत्र में जीवन के बन अर्जुन मै अब  आया
है आकुल मन विकल ह्रदय शरण भगवन मै अब आया

रेखा जोशी

अनुपम कल्पनाओं सा बना यह रंगीन चित्र

सुनहरी किरणों से नभ जगमगाने लगा है
गुलाबी  रंग  आसमान  पर   छाने लगा है
अनुपम कल्पनाओं सा बना यह रंगीन चित्र
मनमोहक दृश्य अब मुझे यह भाने लगा है

रेखा जोशी

Sunday, 3 May 2015

शीशे सा दिल लिये आ गया मै कहाँ

शीशे सा दिल लिये
आ गया मै कहाँ
पत्थरों के शहर में
मुख पर मुखौटे ओढ़े
पाषाण हृदय लिये
संवेदनशून्य
चले जा रहे सब
अपनी ही धुन में
पत्थरों की भीड़ संग
ठोकरों से बचता बचाता
संभालता खुद को
शीशे सा दिल लिये
आ गया मै कहाँ
इससे पहले कहीं
न हो जाऊँ मै चकनाचूर
ऐ दिल भाग कहीं दूर
पत्थरों के शहर से

 रेखा जोशी

Saturday, 2 May 2015

आँचल की छाँव [अलिवर्णपाद छंद]

खेले बचपन
ममता की गोद
माता का दुलार
आँचल की छाँव
चरण वंदन
प्रभु वरदान

रेखा जोशी

फिर होगी सुबह होगा नव नाम

समुद्र तट पर 
चल रहे किनारे किनारे 
मचा रही शोर 
आती जाती लहरे 

सूरज चूम रहा
सागर का आंचल 
रंग सिंदूरी चमक रहा 
आसमां भरा गुलाल 

जीवन चलता रहा 
ढलती है शाम 
फिर होगी सुबह 
होगा नव नाम 

रेखा जोशी 

सुख दुख के साथी

याद है वो दिन
तपती दोपहरी के बाद
शाम को
जब गली में अपनी
लगता था बच्चों का मेला
पड़ोस के सब बच्चे
मिल कर खेलते थे खेल नये
और हाथ में परात  लिये
लगता था मेला
साँझे  चुल्हे  पर
भीनी भीनी पकती 
वह तन्दूर की गर्मागर्म रोटियाँ
याद कर खुशबू जिनकी
आ जाता मुहँ में पानी
पड़ोसी नही थे वो
भाई बंधु थे अपने
सुख दुख  के साथी
हाथ बँटाते बिटिया की शादी में
आँसू  बहाते उसकी विदाई पे
जाने कहाँ गये वो दिन
जब पड़ोसी ही
इक दूजे के काम आते

रेखा जोशी

Friday, 1 May 2015

छोड़ न जाना तुम कभी राह में अकेले

गीतिका

जीवन की राहों में ले हाथों में हाथ
साजन मेरे चल रहे हम अब साथ साथ

अधूरे  है हम  तुम बिन सुन साथी  मेरे
आ  जियें जीवन का हर पल साथ साथ

हर्षित हुआ  मन देख  मुस्कुराहट तेरी
खिलखिलाते रहें दोनों अब  साथ साथ

आये कोई मुश्किल कभी जीवन पथ पर
सुलझा लेंगे  दोनों मिल कर साथ साथ

तुमसे बंधी हूँ मै  साथी यह मान ले
निभायें गे इस बंधन की हम साथ साथ

छोड़ न जाना तुम कभी राह में अकेले
अब जियेंगे और मरेंगे हम साथ साथ

रेखा जोशी