यादें चिपकी हुई उस जर्जर मकान की दीवारों से ढह रहा जो धीरे धीरे घर था कभी जो खिलखिलाती थी जहाँ पीढ़ी दर पीढ़ी न जाने कितनी ज़िन्दगियाँ याद दिलाती होली की देख इन पर पड़े लाल गुलाबी रंगो के कुछ छींटे तस्वीर बसी आँखों में उन ऊँचे बनेरों की जहाँ जगमगाई थी कभी मोमबत्तियाँ दीपावली की रात को गूँजती थी जहाँ बच्चों की किलकारियाँ गम के आँसू भी बहते रहे थे जहाँ आज कैसे सूना सूना बेरंग सा खड़ा सिसकियाँ भरता हुआ