Thursday, 28 February 2013

भगवददर्शन [continued] 4


भगवददर्शन [continued]          'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |
                                                अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
                                                परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् |
                                                  धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे '॥



श्री कृष्ण भगवान् ने जिस विराट रूप का दर्शन अर्जुन को करवाया था वही दर्शन पा कर श्रद्धावान पाठक आनंद प्राप्त करें गे [लेखक प्रो महेन्द्र जोशी ]

श्री कृष्ण नमो नम:

भगवददर्शन 
[श्री मद भगवदगीता अध्याय 11 का पद्यानुवाद ]
आगे ....

22 रूद्र और आदित्य ,वसु और साध्य ,
विश्वदेव अश्विनी मरुत पितर  सब ,
गंधर्व यक्ष राक्षस औ सिद्धगण ,
देखें तुझे ही विस्मित हुए सब ।

23बहु मुख नेत्र बहु पाद जंघा ,
महाबाहो यह महारूप तेरा ,
उदर बड़े और विकराल दाढ़े ,
डरें  लोग देख ,डरें मन मेरा ।

24नभ छू रहा बहु रंगों से दीप्त ,
फैला यह मुख चमके नेत्र बड़े ,
तुझे देख विष्णु भयभीत है मन ,
न इसको धीरज न शान्ति मिले।

25विकराल दाढ़े और मुख तेरे
जो काल अग्नि सदृश धधकते ,
देख सुख न पाऊं ,न जानू दिशा ,
प्रसीद देवेश ,निवास जगत के

26हों प्रविष्ट तुझ में धृतराष्ट्रपुत्र ,
सभी पृथ्वीपालों  के साथ सब ,
भीष्म कर्ण द्रोण और हमारे ,
है मुख्य जो वे योधा भी सब ।  क्रमश:.....


Wednesday, 27 February 2013

व्याजोक्ति [लघु कथा ]


आलोक की बहन रीमा के पति के अचानक अपने घर परिवार से दूर पानीपत में हुए निधन के समाचार ने आलोक और उसकी पत्नी आशा को हिला कर रख दिया |दोनों ने जल्दी से समान बांधा ,आशा ने अपने ऐ टी म कार्ड से दस हजार रूपये निकाले और वह दोनों पानीपत के लिए रवाना हो गए ,वहां पहुंचते ही आशा ने वो रूपये आलोक के हाथ में पकड़ाते हुए कहा ,''दीदी अपने घर से बहुत दूर है और इस समय इन्हें पैसे की सख्त जरूरत होगी आप यह उन्हें अपनी ओर से दे दो और मेरा ज़िक्र भी मत करना कहीं उनके आत्मसम्मान को ठेस न पहुंचे''|अपनी बहन के विधवा होने पर अशोक बहुत भावुक हो रहा था ,उसने भरी आँखों से चुपचाप वो रूपये अपनी बहन रीमा के हाथ थमा दिए | देर रात को रीमा अपनी बहनों के साथ एक कमरे में सुख दुःख बाँट रही थी तभी आशा ने उस कमरे के सामने से निकलते हुए उनकी बाते सुन ली, उसकी आँखों से आंसू छलक गए ,जब उसकी नन्द रीमा के शब्द पिघलते सीसे से उसके कानो में पड़े ,वह अपनी बहनों से कह रही थी ,''मेरा भाई तो मुझसे बहुत प्यार करता है , आज मुसीबतकी इस घड़ी में पता नही उसे कैसे पता चल गया कि मुझे पैसे कि जरूरत है ,यह तो मेरी भाभी है जिसने मेरे भाई को मुझ से से दूर कर रखा है |

भगवददर्शन [continued] 3


भगवददर्शन [continued]          'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |
                                                अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
                                                परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् |
                                                  धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे '॥



श्री कृष्ण भगवान् ने जिस विराट रूप का दर्शन अर्जुन को करवाया था वही दर्शन पा कर श्रद्धावान पाठक आनंद प्राप्त करें गे [लेखक प्रो महेन्द्र जोशी ]

श्री कृष्ण नमो नम:

भगवददर्शन 
[श्री मद भगवदगीता अध्याय 11 का पद्यानुवाद ]
आगे ....
15 देखूं तुम्हारी देह में देव ,
देवता भूतविशेष समूह सब ,
शिव और कमलासन स्थित ब्रह्मा ,
कई सर्प दिव्य और ऋषि भी सभी ।

16 अनेक बाहु मुख उदर और नयन ,
दिखे सर्वत्र अनन्त रूप तेरा ,
न आदि न अंत न मध्य ही दिखे ,
विश्वेश्वर हे विश्व रूप तेरा ।

17 मुकुट और गदा चक्र धारण किये ,
तेजपुंज चमके जो सब ओर से ,
अग्नि और सूर्य सम ज्योतियुक्त ,
असीमित ,कठिन देखना है तुझे ।

18 तुम अक्षर परम तुम ज्ञान योग्य ,
तुम ही विश्व के परम आश्रय हो ,
रक्षक अव्यय शाश्वत धर्म के ,
मानूं  मै तुम सनातन पुरुष हो ।

19 अनादिममध्यान्त अनन्तवीर्य ,
अनंतबाहू शशिसूर्यनयन को ,
अनलदीप्तमुख तुझको मै देखूं ,
जो निज तेज से तपाते विश्व को ।

20 पृथ्वी स्वर्ग मध्य यह अन्तराल ,
और हर दिशा है व्याप्त तुझी से ,
देख कर यह उग्र रूप तुम्हारा ,
है लोक तीनो अत्यंत दुखी ये ।

21 हों प्रविष्ट तुझ में सभी देवता ,
डरे हाथ जोड़ सभी गुण गाते ,
'हो कल्याण 'कह महां ऋषि सिद्धगण ,
उत्तम स्त्रोतों से स्तुति गाते ।   क्रमश :.......



Tuesday, 26 February 2013

भगवददर्शन [continued] 2

भगवददर्शन [continued]         'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |
                                                अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
                                                परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् |
                                                  धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे '॥



श्री कृष्ण भगवान् ने जिस विराट रूप का दर्शन अर्जुन को करवाया था वही दर्शन पा कर श्रद्धावान पाठक आनंद प्राप्त करें गे [लेखक प्रो महेन्द्र जोशी ]

श्री कृष्ण नमो नम:

भगवददर्शन 
[श्री मद भगवदगीता अध्याय 11 का पद्यानुवाद ]
आगे ....

संजय ने कहा -
9 राजन यह कह कर हरि  महायोगेशवर ने ,
दिखलाए अर्जुन को रूप ऐश्वर अपने ।
1o अनेक मुख अनेक नयन ,अद्धभुत अनेक दर्शन ,
अनेक शस्त्र दिव्य औ अनेक दिव्य आभरण ।
11 दिव्यवस्त्र दिव्यमाल और दिव्य गंधयुक्त ,
अनन्त विश्वरूप जो सर्व आश्चर्ययुक्त ।
12 एक साथ नभ में हों सहस्त्र सूर्य ज्यों उदय ,
उन की ज्योति से अधिक ,अधिक जो हो ज्योतिमय ।
13 एकस्थ वहां जगत को विभक्त कई रूप में ,
देखा पार्थ ने देव देव के स्वरूप में ।
14 तब विस्मययुक्त उस रोमहर्षित पार्थ ने ,
शिर झुका हाथ जोड़ कर कहा यह भगवान् से ।  क्रमश: ...


Monday, 25 February 2013

आ गई बहार

आ गई  बहार जो आये हो तुम
चहकने लगी बुलबुल अब दिल की

फूलों पर भंवरे  भी लगे मंडराने
महकने लगा अब आलम सब ओर

तरसती थी निगाहें तुम्हे देखने को
भूल गये अचानक वो रस्ता इधर का

मुद्दते हो चुकी थी देखे हुए उनको
भर दी खुशियों से आज झोली उसी ने

महकती रहे बगिया मेरे आंगन की
खुशिया ही खुशिया बनी रहे दिल में

आ गई  बहार जो आये हो तुम
चहकने लगी बुलबुल अब दिल की

Sunday, 24 February 2013

भगवददर्शन

                                               '
                                                  'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |
                                                अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
                                                परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् |
                                                  धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे '॥



श्री कृष्ण भगवान् ने जिस विराट रूप का दर्शन अर्जुन को करवाया था वही दर्शन पा कर श्रद्धावान पाठक आनंद प्राप्त करें गे [लेखक प्रो महेन्द्र जोशी ]

श्री कृष्ण नमो नम:

भगवददर्शन 
[श्री मद भगवदगीता अध्याय 11 का पद्यानुवाद ]

अर्जुन ने कहा 
1 अध्यात्म परम गूढ़ कहा मुझ पर कर दया ,
आप के इस वचन पर मोह मेरा मिट गया । 
2 भूतों का लय उदभव है सुना विस्तार से ,
औ माहात्म्य आप का ,कमलाक्ष आप से । 
3 जैसा कहा आपने ,आप हो हे ईश्वर ,
देखना मे चाहता रूप अव्यय ऐश्वर ।
4 यदि समझो हे प्रभु मै देख सकता हूँ उसे ,
योगेश्वर दिखाओ रूप अव्यय वह मुझे । 

श्री भगवान ने कहा [To be continued]

खड़ा यहाँ जाने कब से

मै खड़ा यहाँ जाने कब से ,
अब सूखे भी न रहे पत्ते ,
डाली डाली सब सूख चुकी ,
मै खड़ा रहा फिर भी तन के। 
................................
हैं याद मुझे दिन वे गुज़रे ,
सब ओर छटा वैभव बिखरे ,
सम्मोहित से सब रुक जाते ,
इस पथ से जो रही गुज़रे ।
...............................
यह मस्त पवन लहरा जाती ,
अब नही मुझे सिहरा पाती ,
जाने कितने बीते बसंत .
न कभी धडकन भी हो पाती ,
.................................
जाने कब तक मै खड़ा रहूँ ,
यूंही निष्फल निश्वास लिए 
फूल खिलेंगे फिर यहां कभी ,
यह झूठा सा विशवास लिए 

लेखक प्रो महेन्द्र जोशी