Monday, 24 December 2012

पुत्रवती भव

जब मै बचपन में अपनी माँ की उंगली पकड़ कर चला करती थी ,बात तब की है ,हमारे पडोस में एक बूढी अम्मा रहा करती थी ,उन्हें हम सब नानी बुलाते थे | जब भी मेरी माँ उनसे मिलती ,वो उनके पाँव छुआ करती थी और नानी उन्हें बड़े प्यार से आशीर्वाद देती और सदा यही कहती ,''दूधो नहाओ और पूतो फलो ''|उस समय मेरे बचपन  का भोला मन इस का अर्थ नहीं समझ पाया था ,लेकिन धीरे धीरे इस वाक्य से मै परिचित होती  चली गई, ''पूतो फलो '' के  आशीर्वाद को भली भाँती समझने लगी |  क्यों देते है ,पुत्रवती भव का आशीर्वाद ,जब की एक ही माँ की कोख से पैदा होते है पुत्र और पुत्री ,क्या किसी को पुत्री की कोई चाह नहीं ? मैने अक्सर देखा है बेटियां ,बेटों से ज्यादा भावनात्क रूप से अपने माता पिता से जुडी होती है |एक दिन अपनी माँ के साथ मुझे अपने पडोस में एक लडकी की शादी के सगीत में जाने का अवसर प्राप्त हुआ ,वहां कुछ महिलायें 'सुहाग 'के गीत गा रही थी ,''साडा चिड़ियाँ दा चम्बा वे ,बाबल असां उड़ जाना |''जब मैने माँ से इस गीत का अर्थ पूछा तो आंसुओं से उसकी आखे भीग गई | यही तो दुःख है बेटियों को पाल पोस कर बड़ा करो और एक दिन उसकी शादी करके किसी अजनबी को सोंप दो ,बेटी तो पराया धन है , उसका कन्यादान भी करो,साथ मोटा दहेज भी दो उसके बाद उसे उसके ससुराल वालों के भरोसे छोड़ दो,माँ बाप का फर्ज़ पूरा हो गया ,अच्छे लोग मिले या बुरे यह उसका भाग्य ,बेटी चाहे वहा कितनी भी दुखी हो ,माँ बाप उसे  वहीं रहने की सलाह देते रहेगे ,उसे सभी ससुराल के सदस्यों से मिलजुलकर रहने की नसीहत देते रहे गे |माना की हालात पहले से काफी सुधर गये है लेकिन अभी भी समाज के क्रूर एवं वीभत्स  रूप ने बेटी के माँ बाप को डरा कर रखा हुआ है | बलात्कार ,दहेज़ की आड़ में बहुओं को जलती आग ने झोंक देना ,घरेलू हिंसा ,मानसिक तनाव इतना कि कोई आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाए ,इस सब के चलते  समाज के इस कुरूप चेहरे ने बेटियों के माँ बाप के दिलों को हिला कर रख दिया है ,उनकी मानसिकता को ही बदल दिया है,विक्षिप्त   कर दिया है |तभी तो समाज और परिवार के दबाव से दबी,आँखों में आंसू लिए एक माँ अपनी नन्ही सी जान को कभी  कूड़े के ढेर पर तो कभी गंदी नाली में फेंक कर,याँ पैदा होने से पहले ही उसे मौत की नीद सुलाकर सदा के लिए अपनी ही नजर में अपराधिन बना दी  जाती है |ठीक ही तो सोचते है वो लोग '',ना रहे गा बांस और ना बजे गी बासुरी ''उनके विक्षिप्त मन   को क्या अंतर पड़ता है ,अगर लडकों की तुलना में लडकियां कम भी रह जाएँ ,उन्हें तो बस बेटा ही चाहिए ,चाहे वह बड़ा हो कर कुपूत ही निकले ,उनके  बुढापे की लाठी बनना तो दूर ,लेकिन उनकी चिता को अग्नि देने वाला होना चाहिए |जब तक सिर्फ बेटों की इच्छा और  कन्याओं की हत्या करने वाले माँ बाप के विक्षिप्त मानसिकता का सम्पूर्ण बदलाव नहीं होता तब तक बेचारी कन्याओं की इस सामाजिक परिवेश में बलि चढती ही रहे गी |नारी सशक्तिकरण के लिए कितने ही कानून बने ,जो अपराधियों को उनके किये की सजा देते रहते है,भले ही  आँखों पर पट्टी बंधी होने के कारण कभी कभी  कानून भी उन्हें अनदेखा कर देता है |  समाज की विक्षिप्त  मानसिकता में बदलाव लाना हमारी ज़िम्मेदारी है  ,जागरूकता हमे ही लानी है ,लेकिन कब होगा यह ? हमारे समाज में बेटी जब मायके से विदा हो कर ससुराल में बहू के रूप में कदम रखती है तो उसका एक नया जन्म होता है ,रातों रात  एक चुलबुली ,चंचल लड़की ,ससुराल की एक ज़िम्मेदार बहू बन जाती है ,और वो पूरी निष्ठां से उसे निभाती भी है ,क्यों की बचपन से ही उसे यह बताया जाता है की ससुराल ही उसका असली घर है ,वहीउसका परिवार है ,लेकिन क्या ससुराल वाले उसे बेटी के रूप में अपनाते है ? बेटी तो दूर की बात है ,जब तक वो बेटे की माँ नहीं बनती उसे बहू  का दर्जा भी नहीं मिलता |  अभी हाल ही में हमारे पड़ोसी के बेटे की शादी हुयी ,नयी नवेली दुल्हन की मुख दिखाई में मै भी  उसे आशीर्वाद देने पहुंची ,जैसे ही उसने मेरे पाँव छुए ,मेरे मुख से भी यही निकला ,''पुत्रवती भव '' |

Friday, 21 December 2012

अबला से सबला तक

हमारे धर्म में नारी का स्थान सर्वोतम रखा गया है \नवरात्रे हो या दुर्गा पूजा ,नारी सशक्तिकरण तो हमारे धर्म का आधार है \अर्द्धनारीश्वर की पूजा का अर्थ यही दर्शाता है कि ईश्वर भी नारी के बिना आधा है ,अधूरा है\ वेदों के अनुसार भी 'जहाँ नारी की पूजा होती है ' वहाँ देवता वास  करते है परन्तु इसी धरती पर नारी के सम्मान को ताक पर रख उसे हर पल अपमानित किया जाता है \इस पुरुष प्रधान समाज में भी आज की नारी अपनी एक अलग पहचान बनाने में संघर्षरत है \जहाँ  बेबस ,बेचारी अबला नारी आज सबला बन हर क्षेत्र में पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रही है वहीं अपने ही परिवार में उसे आज भी यथा योग्य स्थान नहीं मिल पाया ,कभी माँ बन कभी बेटी तो कभी पत्नी या बहन हर रिश्ते को बखूबी निभाते हुए भी वह आज भी वही बेबस बेचारी अबला नारी ही है \शिव और शक्ति के स्वरूप पति पत्नी सृष्टि का सृजन करते है फिर नारी क्यों मजबूर और असहाय हो  जाती है और आखों में आंसू लिए निकल पड़ती है अपनी ही कोख में पल रही नन्ही सी जान को मौत देने \ क्यों नहीं हमारा सिर शर्म से झुक जाता \कौन दोषी है ,नारी या यह समाज \क्यों कमज़ोर पड़ जाती है नारी \अधूरी है ईश्वर की पूजा अगर यह पाप हम नहीं रोक पाते \ अधूरा है नारी सशक्तिकरण जब तक भ्रूण हत्यायों का यह सिलसिला हम समाप्त नहीं कर पाते \ सही मायने में नारी अबला से सबला तभी बन पाए गी जब वह अपनी जिंदगी के निर्णय स्वयम कर पाये गी \                    

प्रभु मोरे अंगना दरस दिखा जा

 ''नारायण नारायण ''बोलते हुए  नारद मुनि  जी अपने प्रभु श्री हरि को खोजते खोजते पूरे ब्रह्मांड का चक्कर लगा कर भू लोक में आ विराजे ,लेकिन उन्हें श्री हरि कहीं भी दिखाई नही दिए ,''पता नहीं प्रभु कहाँ चले गए ,अंतर्ध्यान हो के कहाँ गायब हो गए मेरे प्रभु ''यह सोच सोच कर बेचारे नारद मुनि जी परेशान हो रहे थे |उन्होंने श्री हरि को इस धरती के कोने कोने में जा करके कहाँ कहाँ नही ढूंढा,.हिमालय पर्वत  की बर्फीली गुफाओं में ,कंदराओं में ,सारी दुनिया के विभिन्न विभिन्न मंदिरों में ,कभी वह देवी माँ के मंदिरों  में खोजते तो कभी स्वयंभू की शरण में जाते ,कभी श्री राम के मंदिर में खोजते तो कभी संकटमोचन हनुमान जी के दर पर पहुंच जाते ,दर ब दर भटकते हुए मक्का मदीना भी घूम आये ,उनकी तलाश में वह दुनिया भर की मस्जिदों में भी अपनी हाजरी लगा  कर आगये ,लेकिन श्री हरिके दरस उन्हें कहीं पर नहीं हुए ,सोचने लगे,'' क्यों न मै उन्हें गिरिजाघर में भी जा कर देख लूँ उस परमात्मा ने ही तो यह सृष्टि बनाई है ,क्या पता वह गिरिजाघर में ही विश्राम कर रहें हो ,''जल्दी से नारद मुनि जी विभिन्न विभिन्न गिरिजाघरों में भी उन्हें तलाश कर के वापिस उसी स्थान पर आ गए ,इतना घूम घूम कर बेचारे थक गए लेकिन उन्हें श्री हरि को पाने लग्न उन्हें विश्राम करने नही दे रही थी ,बहुत ही  चिंतित हो रहे थे वह उनके लिए ,चलते चलते उन्हें एक पेड़ दिखाई दिया ,वहां पर अपनी थकान मिटाने के लिए वह  उसके नीचे  बैठ गए ,पास में ही एक गुरुदुवारा था जहां से लाउडस्पीकर से आवाज़ आ रही थी ,''एक नूर से सब जग उपजया,कौन भले कौन मंदे |''  लाउडस्पीकर की आवाज़ सुनते ही नारद मुनि जी वहां से उठे ओर उनके  पाँव गुरुदुवारे की ओर चल पड़े  यह  सोचते हुए कि गुरुदुवारे के अंदर भी तो उसी परमात्मा के बन्दे बैठे हुए है शायद प्रभु उनका हालचाल पूछने वहां चले  गयें हो |भीतर जा कर देखा सभी भक्त उस प्रभु का नाम ले रहे है ,ऐसा ही कुछ उन्होंने उन सभी धर्मस्थलों पर देखा था ,पूरी धरती पर सम्पूर्ण मानव जन उसी ईश्वर को याद कर रहे थे लेकिन अलग  अलग नामो से |'' नारायण नारायण ,वाह प्रभु यह कैसी माया ,आप तो सभी धर्मस्थलों से  नदारद और पूरी दुनिया बस आप का ही जप कर रही है ,''नारद मुनि जी के मुख से यह शब्द अन्नान्यास ही निकल पड़े |अपने प्रभु  को कहीं भी न पा कर हताश हो कर नारद मुनि जी वापिस उसी पेड़ के नीचे आ कर बैठ गए,थकावट के मारे उनका अंग अंग दर्द करने लगा था इसलिए वह अपनी आँखें मूंद कर उसी पेड़ के नीचे लेट कर सुस्ताने लगे ,लेकिन उनके मन में  हरि से मिलने की प्रबल इच्छा उन्हें आराम नही करने दे रही थी ,तभी कुछ शोर सुन कर उन्होंने आँखे खोली तो देखा सामने एक छोटा बच्चा उनकी नींद में विघ्न डाल रहा था ,वह छोटा सा बच्चा नारद मुनि जी को देख उन्हें अपना मुहं बना बना कर चिढ़ाने लगा,उस नन्हे से बालक पर मुनि को क्रोध आ गया और वह उसे मारने को दौड़े और वह बालक खिलखिला के हंसने लगा ,''अरे यह क्या हुआ ,यह प्यारी हंसी  तो मेरे प्रभु की है ,''उन्होंने आस पास सब जगह अपनी नजर दौडाई ,हतप्रभ रह गए नारद मुनि ,उन्हें तो हर ओर श्री हरि ही दिखाई दे रहे थे ,घबरा कर उन्होंने आँखे बंद कर ली,आत्मविभोर हो उठे नारद मुनि जी ,बंद आँखों से उन्होंने अपने भीतर ही प्रभु श्री हरि के साक्षात दर्शन कर लिए थे ,प्रभु को देखते ही नतमस्तक हो गए नारद मुनि जी और परम आनंद  में झूमते हुए बोल उठे ,''नारायण नारायण |''

Wednesday, 19 December 2012

मानव न बन सका मनुज


यह कविता मेरे पापा प्रोफसर महेंद्र जोशी ने लिखी है |
मै ही तो एक नही हूं ऐसा,
मुझ से पहले भी लोग बड़े थे :
जिन को तो था संसार बदलना ,
अंधेरों में जो लोग खड़े थे :
उन लोगों में मेरी क्या गिनती ,
मुझ से तो वे सब बहुत बड़े थे :
खा कर भी हत्यारे की गोली ,
गांधी जी कितने मौन पड़े थे :
और अहिंसा हिंसा ने खाई ,
था नफरत ने ही प्यार मिटाया :
प्यार दिया इस जग को जिसने ही ,
क्रास पर गया था वह लटकाया :
पर मानव न बन सका मनुज अभी ,
पशुता उसकी उसके साथ रही |

कहाँ है वो जादुई चिराग ?

अलादीन का जादुई चिराग कहीं खो गया ,कहाँ खो गया ,मालूम नहीं ,कब से खोज रहा था बेचारा अलादीन ,कभी अलमारी में तो कभी बक्से में ,कभी पलंग के नीचे तो कभी पलंग के उपर ,सारा घर उल्ट पुलट कर रख दिया ,लेकिन जादुई चिराग नदारद ,उसका कुछ भी अता पता नहीं मिल पा रहा था आखिर गया तो कहाँ गया, धरती निगल गई याँ आसमान खा गया ,कहां रख कर वह भूल गया |”शायद उसका वह जादुई चिराग उसके किसी मित्र याँ किसी रिश्तेदार के यहाँ भूल से छूट गया है”|यह सोच वह अपने घर से बाहर निकल अपने परिचितों के घरों में उस जादुई चिराग की खोज में निकल पड़ा ,लेकिन सब जगह से उसे निराशा ही हाथ लगी |थक हार ,निराश हो कर अलादीन एक पार्क के बेंच पर बैठ गया ,अपने जादुई चिराग के खो जाने पर वह बहुत दुखी था, रह रह कर उसे अपने जादुई चिराग और उसमे बंद जिन्न की याद सता रही थी ,|,”कही उसका जादुई चिराग चोरी तो नहीं हो गया ,”|यह सोच वह और भी परेशान हो गया ,”अगर किसी ऐरे गेरे के हाथ लग गया तो ,बहुत गडबड हो जाए गी ,अनर्थ भी हो सकता है ,नहीं नहीं मुझे अपना वह जादुई चिराग वापिस पाना ही होगा ”|भारी कदमो से अलादीन बेंच से उठा और धीरे धीरे बाहर की ओर चलने को हुआ ही था कि सामने से एक भद्रपुरुष हाथ में जादुई चिराग लिए उसके पास आये |उसे देखते ही अलादीन उछल पड़ा ,”अरे मेरा यह जादुई चिराग आप के पास कैसे ? मैने इसे कहाँ कहाँ नहीं ढूंढा ,मै इसके लिए कितना परेशान था ,कही आपने इससे कुछ माँगा तो नही ?”अच्छा तो आप ही अलादीन है ,आपका यह जादुई चिराग तो सच में बहुत कमाल का है ,मैने इसे अपडेट कर दिया है और इसने कितने ही घरों के बुझते चिरागों को रौशन कर दिया है ,तुम भी देखना चाहो गे ,”यह कहते हुए उस भद्रपुरुष ने अपने हाथ से उस जादुई चिराग को रगडा और उसमे से जिन्न ने निकलते ही बोला, ”हुकम मेरे आका”| ”कौन हो तुम ?”भद्रपुरुष ने पूछा |जिन्न ने बोलना शुरू किया ,”मै अभी ,इसी समय का एक अनमोल पल हूँ ,वह क्षण हूँ मै जो तुम्हारी दुनिया बदल सकता है ,मै वर्तमान का वह पल हूँ जो एक सुदृढ़ पत्थर है तुम्हारे सुनहरे भविष्य की ईमारत का ,तुम चाहो तो अभी इसी पल से उसे सजाना शुरू कर सकते हो ,इस पल कि शक्ति को पहचानो ,व्यर्थ मत गंवाओ इस कीमती क्षण को ,तुम अपनी जिन्दगी की वह सारी की सारी खुशियाँ पा सकते हो इस क्षण में ,वर्तमान के इस क्षण के गर्भ में विद्यमान है हमारे आने वाले कल की बागडोर ,वर्तमान का यह पल हमारे आने वाले हर पल का वर्तमान बनने वाला है ,जीना सीखो वर्तमान के इसी पल में ,जिसने भी इस पल के महत्व को जान लिया उनके घर खुशियों से भर जाएँ गे ,जगमगा उठे गी उनकी जिंदगी ”|इतना कहते ही जिन्न वापिस उस जादुई चिराग में चला गया”| अलादीन अवाक सा खड़ा देखता रह गया ,कभी वह अपने जादुई चिराग को देखता तो कभी मुस्कराते हुए उस भद्रपुरुष को |हाथ आगे बड़ा के उसने उस भद्रपुरुष से अपना वह जादुई चिराग ले लिया और उसी पल उसने फैसला कर लिया कि वह निकल पड़ा अपने जादुई चिराग के साथ पूरी दुनियां को उसका उसका चमत्कार दिखाने |

Monday, 17 December 2012

पिया के घर

सात समुद्र पार कर,
आई पिया के द्वार ,
नव नीले आसमां पर,
झूलते इन्द्रधनुष पे  ,
प्राणपिया के अंगना ,
सप्तऋषि के द्वार ,
झंकृत हए सात सुर,
हृदय में  नये तराने |
.........................
उतर रहा वह नभ पर ,
सातवें आसमान  से ,
लिए रक्तिम लालिमा
सवार सात घोड़ों पर ,
पार सब करता हुआ ,
प्रकाशित हुआ ये जहां
अलौकिक , आनंदित
वो आशियाना दीप्त
...............................
थिरक रही अम्बर में ,
अरुण की ये रश्मियाँ,
चमकी धूप सुनहरी सी
अब आई  मेरे अंगना ,
है स्फुरित मेरा ये मन ,
खिल उठा ये तन बदन
निभाने वो सात वचन ,
आई अपने पिया के घर |

Saturday, 15 December 2012

इक दूजे के लिए

महक , एक खूबसूरत लड़की न जाने कैसे गलत दोस्तों के संसर्ग में आ कर ड्रग्स के  सेवन में उलझ कर रह गई ,मस्ती के आलम में एक ही सिरींज से  उसने अपने साथियों के साथ बांटा ,इस बात से अनभिज्ञ कि वह एक ऐसी जानलेवा बीमारी  को निमंत्रण दे चुकी है जो लाइलाज है ,जी हाँ एड्स यानीकि'‘एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिसिएंशी सिंड्रोम'' जिसका अर्थ है ''मनुष्य की प्रतिरोधक क्षमता कम होने पर अनेक बीमारियों का उस पर प्रहार '' जो की  एच.आई.वी''. वायरस से होती है.और  यह वायरस ही मनुष्य की प्रतिरोधी क्षमता  पर असर कर उसे इतना कमज़ोर कर देता है,जिसके कारण  खांसी ज़ुकाम जैसी छोटी से छोटी बीमारी  भी रोगी की जान ले सकती है |यह जानलेवा बीमारी किसी भी इंसान में एच.आई. वी. ''ह्यूमन इम्यूनो डेफिसिएंशी वाइरस ''के पाजी़टिव होने से होती है ,लेकिन महक इन सब बातों से दूर थी उसने तो सिर्फ अपने एक साथी से ड्रग्स का इंजेक्शन ले कर लगाया था ,इस  बात से बेखबर कि उसने किसी एच आई वी पासिटिव व्यक्ति  के रक्त से संक्रमित हुए इंजेक्शन का सेवन कर लिया था,जिसने उसे मौत के मुहं की तरफ धकेलदिया था ,क्योकि इस बीमारी का इलाज तो सिर्फ  और सिर्फ बचाव में ही है ,अगर कोई''एच आई वी'' से ग्रस्त व्यक्ति किसी भी महिला यां पुरुष  से असुरक्षित यौन सम्बन्ध बनाता है तोवह उसे तो इस बीमारी  से ग्रस्त करता ही है और अगर इस  बीमारी से पीड़ित किसी पुरुष से कोई महिला गर्भवती हो जाती है तो उसके पेट में  पल रहे बच्चे को भी यह जानलेवा बीमारी अपनी ग्रिफ्त में ले लेती है ,इसी कारण हमारे देश में इस रोग से पीड़ित लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है , समलैंगिक सम्बन्ध ,रेड अलर्ट एरिया भी भारी संख्या में इस खतरनाक बीमारी को फैलाने में अच्छा खासा  योगदान दे रहें है ,आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी और अनैतिक संबंधों की बढ़ती बाढ़ से यह बीमारी और भी तेजी से फैल रही है,और  पूरे विश्व के लिए यह एक अच्छी खासी सिरदर्द बन चुकी है,यही वजह है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इस बीमारी को बेहद गंभीरता से लिया है और हर वर्ष पहली दिसंबर को यह दिन ''विश्व एड्स दिवस''के रूप में मनाया जाता है ताकि दुनिया भर में लोगों को इस नामुराद बीमारी से अवगत करा कर इससे बचने के उपाय बताये जा सकें |इस खतरनाक ,लाइलाज बीमारी से अगर कोई ग्रस्त हो गया तो बस समझ लो वह मौत के मुहं में पहुंच चुका है उसके बचने का कोई भी उपाय नही है ,इस जानलेवा बीमारी से बचने का एक मात्र उपाय केवल सावधानी और बस सावधानी ही है ,यह एक ऐसा सुरक्षा चक्र है जो इस भयानक बीमारी से हर किसी को दूर रख सकता है ,वह है पति पत्नी का इक दूजे के प्रति उनका समर्पण भाव ,हमारे हिन्दू धर्म में विवाह को सदा एक पवित्र रिश्ता माना जाता रहा है जिसमे पति के लिए पत्नी और पत्नी के लिए पति पूजनीय है ,कितना ही अच्छा हो अगर हम सब इस रिश्ते की गरिमा को समझ कर सदा अपने जीवन साथी के प्रति समर्पित रह कर एड्स जैसी घिनौनी बीमारी को सदा के लिए अपने से दूर रखें |इससे पहले कि महक जैसे अनेक भटके हुए युवा अपनी जवानी के नशे में जिंदगी के अनदेखे ,अनजाने रास्तों पर चल कर अपनी मौत को खुद ही आमंत्रित करें  हम सबका यह कर्तव्य बनता है कि हम उन्हें सही राह दिखाते हुए इस बीमारी से बचने के लिए पति पत्नी के आपसी प्रेम के सुरक्षा चक्र के बारे में जानकारी दे कर उनका मार्गदर्शन करे ओर उनको एक स्वस्थ और खुशहाल जिंदगी की ओर अग्रसर करे |