मुक्तक
कुछ कर न पाई ज़िन्दगी गई गुजर है
सुख दुःख से भरा यहाँ जीवन सफर है
है बीत गए ज़िन्दगी के अनमोल क्षण
कुछ कर गुजरने को ज़िन्दगी अग्रसर है
रेखा जोशी
ओम की गुंजन
ओम के जाप से हो जाता शान्त मन
गूंज से इसकी हो जाता कंपित तन
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वेदों में बतलाया ओम का स्वरूप
है ओम की महिमा सदा सत्य सनातन
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ओ उ म में है समाया सारा ब्रह्माण्ड
गूंगा भी करता है ओम का उच्चारण
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जप कर ओम नाम होता कल्याण सबका
ओम ही साकार रूप ओम ही निर्गुण
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ओम जाप से जाते कट सभी के पाप
है कण कण में समाई ओम की गुंजन
रेखा जोशी