भगवददर्शन [continued] 'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् |
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे '॥
श्री कृष्ण भगवान् ने जिस विराट रूप का दर्शन अर्जुन को करवाया था वही दर्शन पा कर श्रद्धावान पाठक आनंद प्राप्त करें गे [लेखक प्रो महेन्द्र जोशी ]
श्री कृष्ण नमो नम:
[श्री मद भगवदगीता अध्याय 11 का पद्यानुवाद ]
आगे ....
43 सब जग चराचर के हो पिता तुम ,
तुम पूज्य हो गुरुओं के गुरु तुम ,
तुझ सा न कोई ,हो कैसे अधिक,
प्रभाव त्रैलोक में जिस का अमित ।
44करता नमन धर काया चरण में ,
स्तुतियोग्य तुझको प्रसन्न करने ,
ज्यों पिता पुत्र ,प्रिय प्रिय ,सखा का सखा ,
क्षमा दोष करते ,मुझे दो क्षमा ।
45 हर्षित हुआ देख रूप अदेखे ,
व्याकुल भी है मन मेरा भय से ,
अत: दिखाओ देवरूप मुझको ,
देवेश जगत निवास प्रसन्न हो ।
46 मुकुट शिर ,गदा चक्र लिए हाथ में
आगे ....
43 सब जग चराचर के हो पिता तुम ,
तुम पूज्य हो गुरुओं के गुरु तुम ,
तुझ सा न कोई ,हो कैसे अधिक,
प्रभाव त्रैलोक में जिस का अमित ।
44करता नमन धर काया चरण में ,
स्तुतियोग्य तुझको प्रसन्न करने ,
ज्यों पिता पुत्र ,प्रिय प्रिय ,सखा का सखा ,
क्षमा दोष करते ,मुझे दो क्षमा ।
45 हर्षित हुआ देख रूप अदेखे ,
व्याकुल भी है मन मेरा भय से ,
अत: दिखाओ देवरूप मुझको ,
देवेश जगत निवास प्रसन्न हो ।
46 मुकुट शिर ,गदा चक्र लिए हाथ में
परम रूप अपना निज योग से ,
तेजोमय अनंत विश्वाद्य जो ,
न देखा किसी ने पहले कभी जो ।