Monday, 4 March 2013

भगवददर्शन [continued] 8



भगवददर्शन [continued]          'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |
                                                अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
                                                परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् |
                                                  धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे '॥



श्री कृष्ण भगवान् ने जिस विराट रूप का दर्शन अर्जुन को करवाया था वही दर्शन पा कर श्रद्धावान पाठक आनंद प्राप्त करें गे [लेखक प्रो महेन्द्र जोशी ]

श्री कृष्ण नमो नम:

भगवददर्शन 
[श्री मद भगवदगीता अध्याय 11 का पद्यानुवाद ]
आगे ....

43 सब जग चराचर के हो पिता तुम ,
तुम पूज्य हो गुरुओं के गुरु तुम ,
तुझ सा न कोई ,हो कैसे अधिक,
प्रभाव त्रैलोक में जिस का अमित ।

44करता नमन धर काया चरण में ,
स्तुतियोग्य तुझको प्रसन्न करने ,
ज्यों पिता पुत्र ,प्रिय प्रिय ,सखा का सखा ,
क्षमा दोष करते ,मुझे दो क्षमा ।

45 हर्षित हुआ देख रूप अदेखे ,
व्याकुल भी है मन मेरा भय से ,
अत: दिखाओ देवरूप मुझको ,
देवेश जगत निवास प्रसन्न हो ।

46 मुकुट शिर ,गदा चक्र लिए हाथ में
परम रूप अपना निज योग से ,
तेजोमय अनंत विश्वाद्य जो ,
न देखा किसी ने पहले कभी जो । 







Sunday, 3 March 2013

शुभ प्रभात


उगता भानु
लालिमा गगन की
हुआ उजाला
,...............
पक्षी चहके
हवा के हिचकोले
मौसम हसीं
...............
विहग उड़े
छोड़ अपने नीड़
चुगते दाना
.............
सुंदर समां
फिर सुबह हुई
शुभ प्रभात

भगवददर्शन [continued] 7


भगवददर्शन [continued]          'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |
                                                अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
                                                परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् |
                                                  धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे '॥



श्री कृष्ण भगवान् ने जिस विराट रूप का दर्शन अर्जुन को करवाया था वही दर्शन पा कर श्रद्धावान पाठक आनंद प्राप्त करें गे [लेखक प्रो महेन्द्र जोशी ]

श्री कृष्ण नमो नम:

भगवददर्शन 
[श्री मद भगवदगीता अध्याय 11 का पद्यानुवाद ]
आगे ....

38तुम आदिदेव सनातन पुरुष हो ,
इस विशव के तुम ही आश्रय हो ,
सर्वज्ञ ज्ञातव्य परमधाम हो ,
सकल विश्व में आप ही आप हो

39तुम  अग्नि वायु यम वरूण चन्द्र तुम ,
हो ब्रह्मा और पिता उसके तुम ,
नमन सहत्र बार करू मै तुझे ,
बार बार फिर नमस्ते नमस्ते ।

40नमस्कार हो सामने से तुझे ,
पीछे सभी और सब ओर से ,
हो अनंतवीर्य ,अति विक्रमी तुम ,
सब कुछ ने तुम हो सब कुछ हो तुम ।

41हे कृष्ण यादव हे मेरे सखे ,
यह महिमा तुम्हारी न जानते ,
कहा  जो सखा मान हठ में तुम्हे ,
कहा प्रेम से या प्रमाद से ।

42असत्कृत हुए जो कभी हास में ,
आसन शय्या भोजन विहार में ,
अच्युत अकेले किसी के सामने ,
क्षमा दो अप्रमेय ,उसके लिए । कमश :-..........

Saturday, 2 March 2013

भगवददर्शन [continued] 6


भगवददर्शन [continued]          'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |
                                                अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
                                                परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् |
                                                  धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे '॥



श्री कृष्ण भगवान् ने जिस विराट रूप का दर्शन अर्जुन को करवाया था वही दर्शन पा कर श्रद्धावान पाठक आनंद प्राप्त करें गे [लेखक प्रो महेन्द्र जोशी ]

श्री कृष्ण नमो नम:

भगवददर्शन 
[श्री मद भगवदगीता अध्याय 11 का पद्यानुवाद ]
आगे ....

श्री भगवान ने कहा :-

32मै काल हूँ लोक हनन को बढ़ा ,
अब मै लगा हूँ सब नष्ट करने ,
बिन तेरे भी न यह सब रहेंगे ,
जो योधा खड़े तेरे सामने ।

33द्रोण को भीष्म और जयद्रथ को ,
कर्ण को औ योद्धाओं अन्य को ,
मार इन मरों को दुखी तुम  न हो ,
जीतो गे अवश्य युद्ध तुम करो ।

संजय ने कहा :-

35सुन कर वचन ये तब श्री कृष्ण के
,हाथ जोड़ मुकुटधर ने कांपते ,
कृष्ण से कहा फिर नमस्कार कर ,
भयभीत ने हो गद्गद नमन कर ।

36कृष्ण तेरी कीर्ति से ठीक ही ,
जगत को हर्ष हो और प्रीत भी ,
राक्षस सब ओर डरते दौड़ते ,
और नमन सिद्ध गण करते तुझे ।

37महात्मन ,क्यों न सब तुझ को नमे ,
ब्रह्मा के भी आदि कर्ता हो बड़े ,
देवेश अनंत ,निवास जगत के ,
अक्षर हो तुम सत असत से परे ।  कमश:-.....




Friday, 1 March 2013

लौट आया मेरा बचपन

जब से आई है बिटिया मेरे अंगना में
यूँ महकने लगी है मेरे घर की दीवारें
खिलखिलाती हुई उसकी मधुर हसीं
जान से भी प्यारी हमारी राजकुमारी
........................................................
देखती हूँ जब भी अपनी नन्ही परी को ,
तैरता है इन नयनों में मेरा वो बचपन
वो खुशियों के पल वो चहकते हुए दिन
लौट आया फिर मेरा प्यारा सा बचपन
........................................................
भरी दोपहरी में छुप छुप कर अंगना में
 वो मेरा घर घर खेलना संग गुडिया के
वोह माँ  के  दुपट्टों  से सजना संवरना
कभी साड़ी पहनना कभी चोटी बनाना
.......................................................
चहकती मटकती जब माँ के आंगन में
मुस्करा उठती थी माँ के घर की दीवारे
शाम सवेरे मै नाचती,नचाती थी सबको
थी पापा की प्यारी मै  माँ की थी दुलारी








पति परमेश्वर


''सोनू आज तुमने फिर आने में  देर कर दी ,देखो सारे बर्तन जूठे पड़ें है ,सारा घर फैला पड़ा है ,कितना काम है ।''मीना ने सोनू के घर के अंदर दाखिल होते ही बोलना शुरू कर दिया ,लेकिन  सोनू चुपचाप आँखे झुकाए किचेन में जा कर बर्तन मांजने लगी ,तभी मीना ने उसके मुख की ओर ध्यान से देखा ,उसका पूरा मुहं सूज रहा था ,उसकी बाहों और गर्दन पर भी लाल नीले  निशान साफ़ दिखाई दे रहे थे । ''आज फिर अपने आदमी से पिट कर आई है ''?उन निशानों को देखते हुए मीना ने पूछा ,परन्तु सोनू ने कोई उत्तर नही दिया ,नजरें झुकाए अपना काम करती रही बस उसकी आँखों से दो मोटे मोटे आंसू टपक पड़े । मीना ने इस पर उसे लम्बा चौड़ा भाषण और सुना दिया कि उन जैसी औरतों को अपने अधिकार के लिए लड़ना नही आता ,आये दिन पिटती रहती है ,घरेलू हिंसा के तहत उसके घरवाले को जेल हो सकती है और न जानेक्या क्या  बुदबुदाती रही मीनू । उसी रात देव मीनू के पति रात देर से घर पहुंचे ,किसी पार्टी से आये थे वह ,एक दो पैग भी चढ़ा रखे थे ,मीनू ने दरवाज़ा खोलते ही बस इतना पूछ लिया ,''आज देर से कैसे आये ,?''बस देव का गुस्सा सातवें  आसमान पर पहुंच गया ,आव देखा न ताव कस कर  दो थप्पड़ मीना के गाल पर जड़ दिए । सुबह जब सोनू ने अपनी मालकिन का सूजा  हुआ चेहरा देखा तो वह अवाक उसे देखती रह गई । 

भगवददर्शन [continued] 5


भगवददर्शन [continued]          'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |
                                                अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
                                                परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् |
                                                  धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे '॥



श्री कृष्ण भगवान् ने जिस विराट रूप का दर्शन अर्जुन को करवाया था वही दर्शन पा कर श्रद्धावान पाठक आनंद प्राप्त करें गे [लेखक प्रो महेन्द्र जोशी ]

श्री कृष्ण नमो नम:

भगवददर्शन 
[श्री मद भगवदगीता अध्याय 11 का पद्यानुवाद ]
आगे ....

27 वे भयानक विकराल द्न्त्युक्त ,
तेज चलते जबड़ों में जा रहे ,
दांतों के बीच फसें है कई ,
सिर जिनके चूर्ण हुए जा रहे ।

28नदियों के जल जैसे वेगशील ,
समुद्र की ओर ही सब है जाते ,
वैसे ही नरलोक के वीर सब ,
तेरे प्रज्वल्लित मुखों में जाते ।

29जैसे पतंगे जलते दिए में ,
प्रविष्ट हो वेग से नाश को ,
वैसे वेग से ही लोग सब ,
तेरे मुखों में आते नाश को ।

30प्रज्ज्वलित मुखों में ग्रसित करते ,
चाटते लोक सब सभी ओर से ,
परिपूर्ण कर तेज से सब जगत ,
तपाते हो विष्णु उग्र प्रकाश से ।

31तुम कौन उग्र  रूप मुझे यह कहो ,
नम:देववर हे तू  प्रसन्न हो ,
तुम आध्य को देखना चाहता ,
न जानू तुम्हारी मै प्रवृति को । कमश :.....