Sunday, 7 April 2013

मै बांसुरी बन जाऊं प्रियतम

मै बांसुरी बन जाऊं  प्रियतम
और फिर इसे तुम अधर धरो
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.धुन मधुर बांसुरी की सुन मै
 पाऊं कान्हा को राधिका बन
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रोम रोम यह कम्पित हो जाए
तन मन में कुछ ऐसा भर दो
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प्रेम नीर भर आये नयनों में
शांत करे जो ज्वाला अंतर की
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फैले कण कण में उजियारा
और हर ले मन का अँधियारा
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मै बांसुरी बन जाऊं  प्रियतम
और फिर इसे तुम अधर धरो