Friday, 31 January 2014

चार दिन की चांदनी


लुभाती हम सभी को सुन्दर सलोनी है काया 
लेकिन  देखो तो वक्त की यह कैसी है माया 
सुन्दर से सुन्दर देह भी आखिर जाती है ढल 
चार  दिन की चांदनी  फिर  अन्धेरा  है छाया 

रेखा जोशी