क्षितिज
के उस पार
देख रहे वो बच्चे
कुछ अर्द्धनग्न
कुछ मैले कुचैले कपड़ों में
लिपटे हुए
टकटकी बांधे
निहार रहे शून्य में
एक आस लिए
कभी तो मुस्कुराये गी
धूप वहाँ भी
कभी तो जगमगाएँ गी
वह काली दीवारें
कभी तो खिलें गे
उम्मीदों के फूल
हसें गे तब वह भी
सुन कर लोरियाँ
ख्वाबो के महल में
माँ की
सो गये उम्मीद की
आस लिए
रेखा जोशी
के उस पार
देख रहे वो बच्चे
कुछ अर्द्धनग्न
कुछ मैले कुचैले कपड़ों में
लिपटे हुए
टकटकी बांधे
निहार रहे शून्य में
एक आस लिए
कभी तो मुस्कुराये गी
धूप वहाँ भी
कभी तो जगमगाएँ गी
वह काली दीवारें
कभी तो खिलें गे
उम्मीदों के फूल
हसें गे तब वह भी
सुन कर लोरियाँ
ख्वाबो के महल में
माँ की
सो गये उम्मीद की
आस लिए
रेखा जोशी
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