Monday, 28 October 2013

जाने कहाँ चली गई ज़िंदगी

मेरे घर के पिछवाड़े 
आँगन में सुबह शाम 
पंछियों का चहचहाना
शहतूत के घने पेड़ पर 
जो था  रैन बसेरा 
अनेक जीवों का 
दूर करता 
सूनापन 
बस्ती थी जहाँ अनेक 
ज़िंदगियाँ 
है आज वीरान
खामोश सुनसान  
लेकिन आता याद
वही कलरव 
चहचहाना उनका 
न जाने
कहाँ चली गई 
ज़िंदगी भी उनके साथ 

रेखा जोशी