Monday, 15 July 2013

सौन्दर्य

सौन्दर्य [गीत ]


`बोल उठा है कवि तब ,
असत्य है यह असत्य है ,
ज्ञान और विज्ञानं है भ्रम ,
सौन्दर्य केवल सत्य है ।
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वह पुरुष रच कर प्रकृति को,
था स्वयं इस में खो गया ,
खोजता है फिर स्वयं को ,
क्या आज उसको हो गया ?
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खोज है यह व्यर्थ सी ही ,
है व्यर्थ ही यह भटकना ,
लघु स्वप्न सी यह जिंदगी ,
है व्यर्थ इतना सोचना ।
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सौन्दर्यरस पान ही तो ,
लक्ष्य है इस जिंदगी का ,
सौन्दर्य ही आनंद है ,
सपन है हर किसी का ।
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जो  मिले  आनंद ले ले ,
गम  बहुत  है जिंदगी में
मत व्यर्थ कर तू इन क्षणों को ,
बहुत कम है क्षण ख़ुशी के ।
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सौन्दर्य ही इक सत्य है ,
और है शिव भी यही तो ,
सौन्दर्य में मन को समा तू ,
मन में समा आनंद को ।

 प्रो महेन्द्र जोशी