Sunday, 21 July 2013

पापा टेक केयर

रेलगाड़ी में बैठते ही गरिमा ने चैन की सांस ली ,बस अब चंद घंटों में ही वह अपने माँ के घर होगी ,शादी के बाद वह अपनी ही घर गृहस्थी में खो कर रह गई थी,लेकिन वह अपने बूढ़े माँ बाप को याद कर हमेशा परेशान सी रहती थी ,चाह कर भी उनके लिए कुछ नही कर पाती थी |रेलगाड़ी की गति के साथ साथ गरिमा के मानस पटल पर बचपन की यादें उभरने लगी |”बचपन के दिन भी क्या दिन थे ,जिंदगी का सबसे अच्छा वक्त,माँ बाप का प्यार और उनका वो लाड-दुलार ,हमारी छोटी बड़ी सभी इच्छाएँ वह चुटकियों में पूरी करने के लिए सदा तत्पर ,अपनी सारी खुशियाँ अपने बच्चों की एक मुस्कान पर निछावर कर देने वालों का ऋण क्या हम कभी उतार सकते है ?हमारी ऊँगली पकड़ कर जिन्होंने हमे चलना सिखाया ,इस समाज में हमारी एक पहचान बनाई ,आज हम जो कुछ भी है ,सब उनकी कड़ी तपस्या और सही मार्गदर्शन के कारण ही है ”गरीमा अपने सुहाने बचपन की यादो में खो सी गई ,”कितने प्यारे दिन थे वो ,जब हम सब भाई बहन सारा दिन घर में उधम मचाये घूमते रहते थे ,कभी किसी से लड़ाई झगड़ा तो कभी किसी की शिकायत करना ,इधर इक दूजे से दिल कीबाते करना तो उधर मिल कर खेलना ,घर तो मानो जैसे एक छोटा सा क्लब हो ,और हम सब की खुशियों का ध्यान रखते हुए हमारे माँ बाप ,जिसका जो खाने दिल करता माँ बड़े चाव और प्यार से उसे बनाती और हम सब मिल कर पार्टी मनाते” |

जिंदगी कितनी खूबसूरत है ,इसका अहसास हम तभी कर पाते है ,जब हम इसे जीना चाहते है , जब तक हम अपनी जिंदगी के एक एक पल का आनंद उठाते हुए उसका उपभोग करते रहते है तब तक यह जिंदगी हमे फूलों की सेज सी लगती है ,लेकिन जब जिंदगी एक बोझ सी लगने लगती है तब एक एक पल काटना भारी हो जाता है ,हमारे देश में ऐसे कई घर है जहां जिंदगी की गति बहुत धीमी हो गई है ,समय तो जैसे रुक रुक के रेंग रहा हो ,जहां कभी जिंदगी खिलखिलाती थी वहां एक सन्नाटा सा छाया रहने लगा है |उन घरों में हमारे असहाय बुज़ुर्ग लाचारी भरी जिंदगी जीने पर मजबूर है ,बुढ़ापा तो अपने आप में एक बीमारी है ,धीरे धीरे क्षीण होती यह काया जिसे ढेरों दवाईयों से संभालने की कोशिश ,तन से इतने मजबूर कि रोजमर्रा के काम करने में भी असमर्थ , जहाँ एक एक दिन काटना भी मुश्किल हो वहां कैसे कटे गी उनकी बाकी जिंदगी ?ऐसे ही एक बुज़ुर्ग दम्पति से गरिमा हाल ही में मिली ,बेटा बाहर विदेश में और बेटियां अपने अपने ससुराल में ,अपनी जिंदगी के इस आखिरी पड़ाव में भावनात्मक रूप से आहत ,असुरक्षित बुजुर्गों के प्रति उनके बच्चे क्यों उनका सहारा नही बन पाते ,उनका बेटा अमरीका से आ कर कुछ दिन उनके पास रह कर वापिस चला गया ,जाते जाते प्यार के दो बोल , ”पापा टेक केयर ”बोल कर चला गया |उसके पापा सोचते ही रह गए ,”कौन है यहाँ  जो उनकी केयर करे गा ”?


कई बुज़ुर्ग जो संयुक्त परिवारों में रहते है ,अपने बच्चों द्वारा दी गई एक उपेक्षित जिंदगी जीने के लिए मजबूर है ,आये दिन हम समाचार पत्रों में ऐसी अनेकों खबरें पढ़ते रहते है , कही तो एक बेटे ने अपनी माँ को तबेले में रखा और कही पर बेटे ने अपने बूढ़े माँ बाप को घर से निकाल दिया | क्या गुजरी होगी उस माँ के दिल पर ,उसका अपना बेटा ,उसका अपना खून, इतना संवेदनशून्य ,माँ को पशुओं के साथ .यह सोच कर भी रूह कांप जाती है |कितनी ठेस पहुँचती होगी उन माँ बाप के दिल पर जब उनके अपने बच्चे उनकी भावनायों का गला घोंट कर उन्हें पीड़ा देतें है ,कैसे उस बेटे के मुहं में रोटी का ग्रास जाता होगा जबकि उसके द्वारा घर से निकाले गए उसके माँ बाप ,भूखे प्यासे बैठेखून के आंसू पी रहें हो | कुछ अच्छे ओल्ड एज होम्स इनका आश्रय स्थल बन सकते है ,लेकिन क्या वहां उनके अपनों द्वारा घायल हुए मन को शांति मिल पाए गी ?विचारों की उथल पुथल में डूबी गरिमा गाड़ी से उतर कर ,अपनी माँ के पास पहुच गई |उसने फैसला कर लिया ,अब वह अपने माँ बाप को अकेला नही छोड़े गी ,हर हाल में उन्हें अपने साथ ले कर जाए गी |