Sunday, 5 March 2017

बस्तों के बोझ तले दबता बचपन

बस्तों के बोझ तले दबता बचपन

सुबह सुबह मै अपनी नन्ही गुड़िया की ऊँगली थामे अपने घर के बाहर खड़ी उसकी स्कूल बस का इंतज़ार कर रही थी ,तभी बस स्टैंड पर तीन बच्चे अपने भारी  भरकम बस्ते अपनी पीठ पर लादे हुए मेरे पास आ कर खड़े हो गये।,उन्हें देख कर कोई भी देख कर बता सकता है कि बस्तों के बोझ से बेचारे नन्हे मुन्नों के कंधे झुके हुए थे ।

बस के स्टैंड पर रुकते ही वह बस पर चढ़ने लगे ,जैसी ही एक बच्ची अपने भारी भरकम बस्ते के पीठ पर  टाँगे चढ़ने को हुई,तो भारी से  बस्ते ने उसे पीछे को खींचा और वह लड़खड़ा कर गिरने को ही थी कि बस के कंडक्टर ने पीछे से उसके बस्ते को पकड़ कर उसे गिरने से बचा लिया।मै  भी अपनी गुड़िया को बस में चढ़ा कर वापिस घर की ओर चल पड़ी ,लेकिन इस घटना में मुझे झकझोर दिया ,नन्ही सी जान पर इतना जुल्म ,सुबह से शाम तक स्कूल,उसके बाद शुरू हो जाता है ट्यूशन जाने का सिलसिला ,फिर होमवर्क और हर सप्ताह टेस्ट ,सारा वक्त पढाईऔर बस पढाई ।

मुझे याद है जब मै छोटी थी,शाम होते ही हम सब बच्चे अपनी गली में इकट्ठे हो जाते ,कभी ,छुप्पन छुप्पाई, कभी रस्सी कूदना ,दौड़ लगाना आदि नाना प्रकार के खेल खेला करते थे ,लेकिन आज बच्चों के पास खेलने का समय ही नही मिल पाता ,कहीं पढाई के बोझ तले वह अपना बचपन तो नही खो रहे ,हमे भी समझना चाहिए की उनके व्यस्त जीवनशैली से कुछ।पल उनके खेलने के लिये भी निकालना चाहिये ,जोकि उनके मानसिक विकास के लिए आवश्यक भी है । हम सब जानते है कि स्वस्थ तन और स्वस्थ मन दोनों ही बच्चों के विकास के लिये आवश्यक है ,पढाई के साथ साथ खेलकूद भी पूर्ण विकास के लिए आवश्यक है ,माना कि ज़िन्दगी में पढ़ाई बहुत जरूरी है ,लेकिन साथ साथ अगर उनके शारीरिक विकास को भी हम उतना ही महत्व दें तो वह अपनी पढ़ाईें भी पूर्ण तन्मयता और दिल लगा कर करेंगे।

रेखा जोशी