Sunday, 4 August 2013

नारी सशक्तिकरण आज़ादी से पहले और बाद

नारी सशक्तिकरण आज़ादी से पहले और बाद

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

सुभद्रा कुमारी चौहान जी की लिखी यह पंक्तियाँ वीरांगना झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को समर्पित है ,आज़ादी की प्रथम लड़ाई में उस मर्दानी ने अंग्रेजो से खिलाफ अपनी वीरता का प्रदर्शन कर पूरी स्त्रीजाति को गौरव प्रदान किया था ,लेकिन ऐसी वीरांगनाएँ तो लाखों में  कोई एक ही होती है l इस पुरुष प्रधान समाज में नारी की शक्ति को सदा दबाया गया है ,आज़ादी से पहले की नारी की छवि का ध्यान आते ही एक ऐसी औरत की तस्वीर आँखों के आगे उतर कर आती है जिसके सिर पर साड़ी का पल्लू ,माथे पर एक बड़ी सी बिंदिया ,शांत चेहरा और हमेशा घर के किसी न किसी कार्य में व्यस्त ,कई बार तो सिर का पल्लू इतना बड़ा हो जाता था कि बेचारी अबला नारी का पूरा चेहरा घूँघट में छिप कर रह जाता था ,उसका समय अक्सर घर की दहलीज के अंदर और पुरुष की छत्रछाया में ही सिमट  कर रह जाया करता  था l  अधिकतर परिवारों में बेटा और बेटी में भेद भाव आम बात थी नारी का पढ़ना लिखना तो बहुत की बात थी ,समाज में ऐसी अनेक कुरीतियाँ,बाल विवाह ,दहेज प्रथा ,सती प्रथा आदि पनप रही थी जिसका सीधा प्रभाव  नारी को भुगतना पड़ता था ,लेकिन समय के चलते मदनमोहन मालवीय जैसे कई समाजसेवी आगे आये और धीरे धीरे ऐसी कुप्रथाओं को समाप्त करने के बारे में लोगों में जागरूकता बढ़ी और कालान्तर समाज का स्वरूप बदलने लगा ,आज इक्सिवीं सदी की महिलायें घूँघट को पीछे छोड़ते हुए बहुत आगे निकल आई है lआज की नारी  घर की दहलीज से बाहर निकल कर शिक्षित हो रही है ,उच्च शिक्षा प्राप्त कर पुरुष के साथ कन्धे से कन्धा मिला कर सफलता की सीढियां चढ़ती जा रही है l आर्थिक रूप से अब वह पुरुष पर निर्भर नही है बल्कि उसकी सहयोगी बन अपनी गृहस्थी की गाड़ी को सुचारू रूप से चला रही है l बेटा और बेटी में भेद न करते हुए अपने परिवार को न्योजित करना सीख रही है ,लेकिन अभी भी वह समाज में अपने अस्तित्व और अस्मिता के लिए संघर्षरत है ,दहेज प्रथा ,कन्या भ्रूण हत्या जैसी बुराइयों का उसे सामना करना पड़  रहा है ,भले ही समाज में खुले घूम रहे मनुष्य के रूप में जानवर उसकी प्रगति में रोड़े अटका रहे है ,लेकिन उसके  अडिग आत्मविश्वास को कमजोर नही कर पाए l  हमारे देश को श्रीमती इंदिरा गांधी ,प्रतिभा पाटिल जी  ,कल्पना चावला जैसी भारत की बेटियों पर गर्व है ,ऐसा कौन सा क्षेत्र है जिस में आज की नारी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन न कर पा रही हो | आज नारी बदल रही है और साथ ही समाज का स्वरूप भी बदल रहा है ,वह माँ बेटी ,बहन पत्नी बन कर हर रूप में अपना कर्तव्य बखूबी निभा रही है |

विश्व से पर्वत सी टकरा सकती है महिला
विश्व को फूल सा महका सकती है महिला
विश्व के प्रांगण में वीरांगना लक्ष्मी है महिला
विश्व फिर भी कहता है अबला है महिला