Sunday, 7 September 2014

कुछ नही बच पायेगा

काटो  पेड़
जंगल जंगल
मत खेलो
कुदरत से खेल
कर देगी अदिति
सर्वनाश जगत का
हो जायेगा
धरा पर
सब कुछ फिर मटियामेल
कुपित हो कर
प्रकृति भी तब
रौद्र रूप दिखलाएगी
बहा ले जायेगी सब कुछ
संग अपने जलधारा में
समा जायेगा
जीवन भी उसमे
कुछ नही  
बच पायेगा शेष
फिर
कुछ नही
बच पायेगा शेष

रेखा जोशी