Sunday, 8 September 2013

''अपना अंगना ''में दिव्या जी दुवारा रेखा जी से साक्षात्कार

shared Nisha Mittal's photo. ''अपना अंगना ''में दिव्या जी दुवारा रेखा जी से साक्षात्कार 
दिव्या की अनुपस्थिति में आज की प्रस्तुति साक्षात्कार (जो दिव्या द्वारा ही लिया गया और तैयार किया गया है ) मैं आपके लिए प्रस्तुत कर रही हूँ
नमस्कार, साथियों अपना अंगना में आप सभी का स्वागत है | आज रविवार को खास ब्लोगिंग जगत के किसी खास ब्लोगर का साक्षात्कार लेके आते है | मैं जिनसे आप का परिचय कराने जा रही हूँ वो बहुत सौम्य, मृदु भाषी है साथ ही एनर्जेटिक है एक अध्यापिका के रूप में जहाँ वो बहुत से छात्र छात्राओं का भविष्य बनाने में भूमिका निभाई है वहीं अपने लेखन से उन्होंने जागृति फैलाई है ... निरंतर लेखन में सक्रिय बहुत से ब्लॉग और पत्रिकाओ में उनकी कहानी कविताये छपती आई है वहीं उनके द्वारा लिखी लघु कथा कहानी का मंचन उन्ही के छात्रों द्वारा भी हुआ है जी हाँ हम बात कर रहे है रेखा जोशी जी की आइये उन्ही से जानते है कुछ उनके अनछुए पहलु के बारे में उन्ही से
दिव्या : रेखा जी हम आप को एक ब्लोगर के रूप में जानते है ,आप कुछ अपने विषय में बताइए?
रेखा जी: प्रिय दिव्या ,मेरा जन्म अमृतसर में हुआ था, मेरे पापा हिन्दू कालेज अमृतसर से वाइस प्रिंसिपल रिटायर हुए थे। उन्होंने हम सभी बहनों को ऊँची शिक्षा एवं अच्छे संस्कार दिए । हिन्दू कालेज ,अमृतसर से मैने बी एस सी ,[नान मेडिकल] से किया और बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी से एम् एस सी [भौतिक विज्ञानं ] से किया ,उसके बाद शादी हो गई और सर्विस भी मिल गई ,मेरे पति केंद्र में सरकारी नौकरी में कार्यरत थे और वहीँ से रिटायर हुए । 1978 में मुझे फरीदाबाद में'' के एल एम् दयानंद कालेज फार वीमेन ''में भौतिक विज्ञानं विभाग में लेक्चरार की नौकरी मिल गई और हमने दिल्ली से फरीदाबाद शिफ्ट कर लिया ,32 साल के अंतराल बाद मै इसी कालेज से जून 2010 में रिटायर हुई ,मुझे रिटायरमेंट के बाद भी जाब की आफर आई पर मैने इनकार कर दिया क्योकि मेरा झुकाव लेखन में था

दिव्या : आप विज्ञान की छात्रा रही है साथ है, साथ ही आप ने अध्यापन का विषय भी साइंस रहा है | साहित्य में रुझान किस तरह हुआ

रेखा जी:जी हाँ दिव्या मैने फिजिक्स में एम् एस सी किया था और अध्यापन भी इसी विषय में किया ,साहित्य के प्रति मेरी रूचि बचपन से ही है ,मै यही कहना चाहूँ गी यह शौंक मुझे विरासत में मिला ,मेरी दादी ,मेरे पापा और मेरे चाचा सब कुछ न कुछ हिंदी में लिखा करते थे , मै अपनी बरसों पुरानी हाबी को पुनः जीवित करना चाहती थी | मेरी दादी हिंदी की टीचर थी और उनकी अलमारी में सभी विरिष्ठ हिंदी लेखकों की पुस्तकें थी,गुरुदेव रविन्द्रनाथटैगोर,शरतचंद्र ,मुंशी प्रेमचंद्र की लिखी पुस्तकें मैने आठवी कक्षा के बाद हुई छुट्टियों में अपनी दादी की अलमारी से निकाल कर पढ़ ली थी ,वैसे कई बाते उस समय मेरी समझ से परे थी लेकिन मुझे उन्हें पढना बहुत अच्छा लगता था ,उनके उपन्यास पढ़ते हुए मै भावविभोर हो जाती थी और मेरी आँखों से आंसू बहने लगते थे |मेरी माँ भी यही कहती है की मै जब बहुत छोटी थी तब भी मै किसी को दुखी नही देख सकती थी और उसके दुःख को अपना समझ कर रो पडती थी ,मै आज भी वैसी ही हूँ और कोशिश करती हूँ की किसी तरह से उनके दुःख को कम कर सकूं |

दिव्या आप शादी से पहले जॉब करते थे फिर शादी दूसरे शहर होने के कारण नौकरी छोडनी पड़ी | क्या कशमकश रही थी उस समय मन में
रेखा जी:हाँ दिव्या। एम् एस सी के तुरंत बाद मेरी सेक्रेड हार्ट कान्वेंट स्कूल ,अमृतसर में साइंस टीचर की नौकरी लग गई थी ,लेकिन शादी के बाद मुझे नौकरी छोडनी पड़ी क्योकि मेरे पति दिल्ली में सरकारी नौकरी किया करते थे। नौकरी तो मैने उस समय ख़ुशी से छोड़ थी ,लेकिन बाद में मुझे बहुत अफ़सोस हुआ था ,उस समय मेरे बच्चे बहुत छोटे थे और मै दूसरी जॉब का सोच भी नही सकती थी ,चार साल के अंतराल के बाद मुझे फिर से अमृतसर के एक कालेज में लेक्चरार की नौकरी मिल गई थी,जहां मै केवल दो वर्ष ही रह पाई थी ।

दिव्या: शादी के कुछ सालो बाद फिर से नौकरी करना .. क्या कठिनाई आई और क्या सहयोग मिला परिवार से
रेखा जी: जब मुझे दुबारा नौकरी मिली तब मुझे बहुत ख़ुशी हुई थी ,लेकिन मुझे दो वर्ष पति से अलग रहना पड़ा था । उस समय मेरे पति ने भी होम टाउन में बदली करवाने की बहुत कोशिश की थी लेकिन नियति में हमारा अलग रहना लिखा हुआ था । उस वक्त मेरी सासू माँ और मेरी मम्मी ने मुझे पूरा सहयोग दिया ,उनके साथ होने से मुझे अपने बच्चों की चिंता नही रहती थी और मैने घर की जिम्मेदारियों से मुक्त हो कर पूरी निष्ठा से सर्विस की । दो साल बाद मुझे फरीदाबाद में जाब मिल गई ,तब हमने फरीदाबाद में शिफ्ट कर लिया और तब से यहीं के हो कर रह गए ।
दिव्या: आप का बचपन कैसा रहा
रेखा जी: बचपन की याद आते ही मेरे होंठों पर मुस्कुराहट आ जाती है,सबसे बड़ी बेटी होने के नाते से मुझे घर में सभी का प्यार मिला ,मम्मी पापा तो प्यार करते ही थे मेरी दादी मुझे अपनी बेटी की तरह प्यार करती थी ,मेरे चाचा मुझे हमेशा अपनी छोटी बहन मानते है आज भी मै उनकी कलाई पर राखी बांधती हूँ ,जब मै छोटी थी तब मेरा हर जन्मदिन बहुत धूमधाम से मनाया करते थे ,मेरे नाना जी का घर हमारे घर के पास था ,इस कारण हमारा परिवार एक बहुत बड़ा संयुक्त परिवार की तरह था ,मै और मेरी बहने अक्सर अपने ममेरे भाई बहनों के साथ खूब हल्ला मचाया करते थे ,बहुत ही प्यारे दिन हुआ करते थे ।
दिव्या : आप अमृतसर से ..जहाँ का स्वर्ण मंदिर विश्व प्रसिद्ध है ... अमृतसर की कोई और बात जो आप हमारे साथ साझा करना चाहेंगी
रेखा जी: मै एक बहुत ही शर्मीली लड़की हुआ करती थी ,घर से स्कूल याँ फिर कालेज और फिर घर वापिस ,ज्यादा इधर उधर घूमती नही थी। मेरी दादी का आदेश था की शाम को घर में बत्ती जलने से पहले वापिस घर पहुंच जाओ ,बस तब से यही आदत बन गई । विश्व प्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर के मैने बहुत बार दर्शन किये है ,जब भी अमृतसर जाती हूँ ,एक बार तो अवश्य दर्शन करने जाती हूँ ,बहुत सुकून मिलता है वहां जा कर ।
दिव्या :शादी के बाद आप दिल्ली आ गए थे कहा जाता है दिल्ली दिल वालो की .. क्या कहना चाहेंगी इस विषय में क्या सच में दिल्ली दिल वालो का शहर है
रेखा जी: ठीक कहा दिव्या ''दिल्ली है दिल वालो की'' शादी के बाद मेरे दिल्ली आने पर मेरे पतिदेव ने मुझे पूरी दिल्ली की सैर करवाई ,हम लोग वसंत विहार और उसके बाद मुनीरका डी डी ए फ्लैट्स में रहे ,वहां से हम हर रोज़ शाम को पैदल ही घूमते हए चाणक्य थियेटर तक और वापिसी भी पैदल मार्च करते हुए आते थे ,बहुत अच्छे दिन थे वो ।
दिव्या: आप की एक कहानी में देहरादून के टपकेश्वर मंदिर का जिक्र है तो हमारा शहर कैसा लगा कुछ इस विषय में बताइए
रेखा जी: जी हाँ दिव्या ,वैसे तो मै आपके शहर देहरादून बहुत बार गई हूँ देहरादून मेरे पति का पसंदीदा शहर है क्योकि उन्होंने पी जी डी ए वी कालेज से कैमिस्ट्री में एम् एस सी किया था और उनकी कई यादें इस शहर से जुडी हुई है ,लेकिन टपकेश्वर मंदिर मै दो बार ही जा पाई , आज भी जब मै आँखे बंद करती हूँ उस स्थल का पूरा दृश्य आँखों के सामने आ जाता है ,दो बहुत पुराने वटवृक्ष और नीचे की ओर जाती हुई सीढियां ,मंदिर के अंदर का शांत वातावरण ,शिवलिंग के उपर टपकता जल और पीछे कल कल बहता हुआ जल ,मन को शान्ति देता हुआ बहुत ही मनमोहक दृश्य ,बहुत ही अच्छा लगा वहां जा कर ।
दिव्या: भ्रष्टाचार, अनैतिकता, दुर्व्यवहार हत्या ..समाचार पत्र इसी तरह की घटनाओ से भरा रहता है समाज में व्याप्त बुराई की मुख्य वजह आप किसको मानती है
रेखा जी: सच में दिव्या हमारे समाज में अनेक बुराईयाँ व्याप्त है और इन सब की मूल जड़ हमारे विलुप्त होते संस्कार है ,आजकल हर आदमी भौतिकवादी बन रहा है ,पैसे के पीछे भाग रहा है ,एक दूसरे को देख कर लोगों में लालच बढ़ रहा है जो भ्रष्टाचार का मुख्य कारण है ,एकल परिवारों की वृद्धि हो रही है ,भागा दौड़ी की इस जिंदगी में माँ बाप को अपने बच्चों के लिए समय ही नही मिल पाता । एक और वजह है जिसे मै अवश्य कहना चाहूँ गी वह यह है कि हमारे समाज में अमीर और गरीब के बीच की बढती खाई ,आजकल इतनी महंगाई हो गई है कि गरीब की मूलभूत आवश्यकतायें ही पूरी नही हो पाती ,यह कारण भी देश में बढ़ती अराजकता का कारण बनता जा रहा है । तीसरी मुख्य वजह शराब है,जिसे पी कर इंसान अपने होश खो बैठता है , इसकी बिक्री पर तत्काल रोक लग जानी चाहिए ।

दिव्या: लड़कियों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार की घटनाओ की संख्या दिनों दिन बढ़ रही है समाज में हर कोई चिंतित है फिर भी लड़कियों के साथ हो बढ़ रही इन घटनाओ के पीछे किस को दोषी मानेगी ???
रेखा जी: यह एक गम्भीर और चिंताजनक विषय है ,लडकियों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार का कारण हमारे समाज की ही संस्कारहीन पीढ़ी ,विक्षिप्त मानसिकता लिए हुए उभर कर आ रही है। अशिक्षित नारी ,परिवारों में नारी की अवहेलना करना ,उसे पड़ताडित करना ,जब नारी ही निराश और उपेक्षित रहे गी वह अपनी संतान को क्या संस्कार दे पायगी ,इस पुरुषप्रधान समाज में जो बच्चे देखेंगे वह वही सीखेंगे और उसी का अनुसरण भी करेंगे । लडकियों के साथ हो रहे दुर्वयवहार के लिए सरकार और न्याय व्यवस्था भी ज़िम्मेदार है ,आरोपियों को जल्द से जल्द कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए ताकि आगे से कोई दुर्व्यवहार करने से पहले हजार बार सोचे ।
दिव्या: अक्सर एक लड़की को दोष दे दिया जाता है आप का क्या विचार है इस विषय में
रेखा जी: दिव्या ,लड़की जो स्वयम घटना की शिकार होती है उसे दोष देना सरासर अनुचित है ,उसका तो तन मन और आत्मा तक आहत होती है और उसके लिए जो भी दोषी पाया जाये उसे तुरंत सजा मिलने का प्रवधान होना चाहिए ।
दिव्या: कहा जाता है जैसा राजा होगा वैसी ही प्रजा होगी ... हमारे देश के हालत देखते हुए आप क्या सोचती है क्या हमरे देश के नेताओ का आचरण अनुकरणीय है ???

रेखाजी: दिव्या आपकी यह बात बिलकुल सही है'' जैसा राजा होगा वैसी ही प्रजा होगी''समाज में हर बुराई उपर से नीचे को आती है जब उपर करोड़ों के घोटाले हो रहे हो तो बेचारा एक चपड़ासी क्यों नही सौ रूपये की रिश्वत ले सकता ,हमारा देश सचमे रसातल में जा रहा है ,यह एक विचारणीय विषय है ।
दिव्या: एक तरफ युवा वर्ग जनहित के लिए सोचता है उसमे आक्रोश है देश की अव्यवस्था में वहीँ दूसरी तरह बुजुर्ग नेता कहे या संत उनका आचरण कहीं से भी विचारणीय नहीं है
रेखा जी: हाँ ,आज की युवा शक्ति बहुत कुछ कर सकती है ,उनमे पनप रहे आक्रोश को जरूरत है साकारात्मक दिशा निर्देश की ,हम सब ने देखा है किस तरह अन्ना के आन्दोलन में युवा को एकजुट होते ,दामिनी हो या गुडिया अन्याय के विरुद्ध हमारे देश के युवा एकमत है और मुझे विशवास है कि एक दिन यही युवा वर्ग इस देश मे बदलाव लायेगा ।
दिव्या: आप एक अध्यापिका भी रही है को ऐसी घटना जिसमे जिंदगी में एक सबक दिया हो
रेखा जी : दिव्या, अध्यापन एक ऐसा पेशा है जिसमे आप युवा वर्ग के संसर्ग में रहने कारण उन्हें बहुत नजदीक से देखते हो और उनको समझ सकते हो ,मैने एक ऐसी छात्रा को करीब से देखा है जिसने अपने पिता की मौत के बाद पढाई के दौरान पार्ट टाइम नौकरी करते हुए कठिन परस्थितियों में अपने छोटे भाई बहनों और माँ को संभाला ,आज वह आर्मी में सैकिंड लेफ्टिनेंट की पोस्ट पर कार्यरत है ,जब मन में कुछ करने की इच्छा और विश्वास हो तो जिंदगी में बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है

दिव्या: गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पाय, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय। भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सबसे ऊपर है पर आज के समय में छात्र न तो गुरु की इज्जत करते है और न ही अब गुरुजन भी छात्रो के भविष्य के लिए सोचते है आप के क्या विचार है इस विषय में

रेखा जी: भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सदा सबसे ऊपर रहा है ,भारतीय परमपरा में गरु शिष्य प्रणाली के अनेक उदहारण मिलते है लेकिन यह भी एक गम्भीर विषय है, आजकल शिक्षा का व्यवसायीकरण हो रहा है जो देश के लिए ठीक नही है जब शिक्षा को पैसे से तोला जाए गा तो ज्ञान का ह्रास निश्चित है तब न तो छात्र अध्यापक की इज्जत करें गे और अध्यापक बस अपनी झोली भरते रहेंगे ।
दिव्या: आज कल न्युकिलर फेमली का चलन बढ़ा है इसके बहुत से नुकसान देखने को मिल रहे है फिर भी सब एकल परिवार में ही रहना चाहते है ... आप का क्या कहना
रेखा जी : यह सही है कि आज कल न्युकिलर फेमली का चलन बढ़ा है परन्तु कई बार नौकरी दूर होने के कारण भी एकल परिवारों की संख्या में वृद्धि हो रही है ,बच्चे अपने माता पिता को साथ रखना चाहते है लेकिन माँ बाप ही वह जगह नही छोड़ना चाहते जहां उन्होंने सारी जिंदगी बिताई है ,वैसे अगर देखा जाए तो संयुक्त परिवार के अनेक फायदे है अगर इस पर लिखने बैठूं गी तो पूरा ब्लॉग तैयार हो जाएगा

दिव्या: आधुनिकता और विकास के नाम पर हम अपनी संस्कृति और सभ्यता को विनाश के मुहाने में ला के छोड़ दिया है क्या विकास के नाम पर अन्धानुकरण सही मानती है आप

रेखा जी: कुछ हद तक यह सही है कि आधुनिकता और विकास के नाम पर हम अपनी हम अपनी संस्कृति और सभ्यता को भूल रहे है और विकास के नाम पर अन्धानुकरण तो बिलकुल गलत है ,हमे अपनी संस्कृति और सभ्यता को साथ लेते हुए दुनिया के साथ चलना है और देश को विकसित करना है

दिव्या: आप का पहला ब्लॉग किस में था ब्लोगिंग जगत में जुड़ना कैसा हुआ
रेखा जी : जी,मैने कब लिखना यह तो मुझे भी याद नही , जब स्कूल ,कालेज,यूनिवर्सिटी में मै पढ़ती थी तब मै लेख कविता और विज्ञान के कई विषयों पर हिंदी एवं अंग्रेजी में लिखा करती थी,अपने कार्यकाल के दौरान आल इण्डिया रेडियो ,रोहतक से विज्ञान पत्रिका के अंतर्गत अनेक बार मेरे दुवारा वार्ता प्रसारण भी हुआ,अपनी नौकरी केकार्यकाल में भी मैने कई लघु नाटक लिखे है जिसका छात्राओं ने मंच पर प्रदर्शन कर कई इनाम भी जीते है । लेखिका के रूप में मै रिटायरमेंट के बाद पहली बार जागरण जंक्शन पर आई और उसके बाद मैने पीछे मुड़ कर नही देखा .पत्रिकाओं में सबसे पहले ''वुमेन आन टाप'' में मेरा लेख ''बड़े मियाँ दीवाने ''प्रकाशित हुआ ,उसके बाद 'मेरी सजनी '',दिल्ली प्रेस ''से प्रकाशित पत्रिका ,कई ई पत्रिकाएँ ,निर्झर टाइम्स व् अन्य कई अखबारों में मेरे लिखे हुए लेख ,कवितायें प्रकाशित होने लगी | अपनी इस कामयाबी का श्रेय मै जागरण जंक्शन को देती हूँ ।

दिव्या: ब्लोगिंग से जोडी कोई मजेदार घटना
रेखा जी: ब्लोगिंग से जुडी कोई घटना तो इस समय मेरे जहन में नही आ रही ,हाँ यह मेरा सौभाग्य है कि जे जे के कारण, मै आपसे,निशा जी ,प्रदीप सिंह खुशवाहा जी ,शाशिभूष्ण जी ,जवाहर जी ,योगी जी अनिल जी ,संतोष जी ,चातक जी ,मनोरंजन जी ,रीता जी ,सरिता जी और कई अन्य लेखक मित्रों से मेरी जान पहचान हो पाई|

दिव्या: जिंदगी का यादगार लम्हा
रेखा जी: जिंदगी का यादगार लम्हा ,मेरा अपने पति से मिलना था ,उस पल को ,जब मैने उन्हें पहली बार देखा था वह पल आज भी मेरी आँखों में बसा हुआ है ।

दिव्या : कोई ऐसा पल जिसको आप बदलना चाहेंगी
रेखा जी :नही दिव्या ,जिंदगी बहुत खूबसूरत है ,जो कुछ भी मुझे मिला है और जो भी आगे मिलेगा सबका स्वागत है ।
दिव्या: रेखा जोशी को आप क्या कहेंगी
रेखा जी : रेखा जोशी एक ऐसी शख्सियत है जो हर ज़िम्मेदारी को पूर्णता से करना जानती है ,चाहे वह कोई घरेलू कार्य हो याँ कोई समाज से जुड़ा अन्य कार्य ,वह समस्याओं को सुलझाने में यकीन करती है न कि उनके संग चलने में ।

दिव्या: कोई पसंदीदा पंक्ति या सूक्ति
रेखा जी: परमात्मा पर सदा विश्वास रख कर वही कार्य करो जो आपकी अंतरात्मा आपसे करने को कहती है ।

दिव्या: कुछ शब्द जिनका आप को अपने शब्दों में परिभाषित करना है
रेखा जी
गुरु
गुरु वही जो अपने शिष्यों को सही मार्ग दिखाए और उस पर चलने की प्रेरणा दे ।

माँ
माँ ईश्वर का दूसरा नाम है और अपनी संतान की प्रथम गुरु ।

परिवार
परिवार वही है जहां सभी सदस्य प्रेमपूर्वक मिलजुल कर रहें ।

शादी
शादी एक प्यार भरा बंधन ।

समाज
समाज ऐसे लोगों का समूह जो सुख दुःख में एक दूसरे का साथ दे
कोई एक ख्वाहिश
मिर्ज़ा ग़ालिब के अनुसार ''हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले ''
मेरी स्वरचित पंक्तियाँ
चाहते चाहते चाहते है
ज़िन्दगी में चाहते
कुछ पूरी कुछ अधूरी
चलता रहे यह यूं ही
न खत्म हो कभी भी
यह सिलसिला। ……
बहुत ही सुंदर रचना बहुत अच्छा लगा आप से बात करके, अपना अंगना में आपकी उपस्थिति ने यादगार बना दिया है आप यूँ हीं लिखते रहिये इसी दुआ के साथ हम विदा लेते है फिर मिलेंगे चलते चलते ...