Monday, 19 May 2014

सिसकियाँ भरता जर्जर मकान

यादें चिपकी हुई
उस जर्जर मकान की
दीवारों से
ढह रहा जो
धीरे धीरे
घर था कभी जो
खिलखिलाती थी जहाँ
पीढ़ी दर पीढ़ी
न जाने कितनी
ज़िन्दगियाँ
याद दिलाती होली की
देख इन पर पड़े
लाल गुलाबी
रंगों के छींटे
गूँजती थी जहाँ
बच्चों की किलकारियाँ
गम के आँसू भी
बहते रहे जहाँ
आज कैसे सूना सूना
बेरंग सा खड़ा
सिसकियाँ भरता हुआ

रेखा जोशी