Thursday, 29 May 2014

तूफ़ान छुपाये सीने में अपने


लहरें गिरती उठती 
सागर की
शोर मचाती आती
और 
साहिल के पग चूमती
फिर
वापिस लौट जाती
झिलमिलाती
विशाल सीने पर चमकती 
सुनहरी रश्मियाँ अरुण की 
असीमित नीर
समेट अपने में
अथाह शक्ति
फिर भी
शांत है विस्तृत सागर 
तूफ़ान छुपाये
सीने में अपने 
मत करना विचलित इसे 
हो क्रोधित
बहा ले जायेगा सब कुछ 
संग अपने 
तोड़ कर सीमायें सब 
बन सुनामी 
कर देगा तहस नहस 
सब ओर 

रेखा जोशी