Tuesday, 10 February 2015

जायें तो कहाँ जायें रहे विचार जीव असहाय

फैला प्रदूषण
हर तरफ
जल हो या थल
या हो फिर चाहे गगन
जायें  तो कहाँ जायें
रहे विचार जीव असहाय

रहने को पेड़ नहीं
पानी में मिला मल
हस्ताक्षेप कर प्रकृति से
रुष्ट किया उसे मानव ने
विषाक्त है  धरा गगन
घुला  पानी में ज़हर
जायें  तो कहाँ जायें
रहे विचार जीव असहाय

लुप्त हो रही
प्रजातियाँ कई
रहने का ठौर ठिकाना नहीं
जायें  तो कहाँ जायें
रहे विचार जीव असहाय

रेखा जोशी