Thursday, 17 March 2016

जमीं आसमान को रंगीन बनाता

कल्पना की  सीढ़ी पर
हो कर सवार
छू लिया आज सतरंगी
आसमान
खेलता  छुपा छुपी
बादलों से कभी
बन मेघ कभी भिगो देता
आँचल धरा का
चुरा कर इन्द्रधनुष के
रँग कभी
सजाता मांग
अवनी की अपनी
कल्पना के सागर में
गोते  लगाता
जमीं आसमान को
रंगीन बनाता
बरसाता ख़ुशी आसमान से
लहराती धरा पर
अमृत ले आता

 रेखा जोशी