Sunday, 2 August 2015

पिया के द्वार

एक पुरानी छंदमुक्त रचना 

सात समुद्र पार कर,
आई पिया के द्वार
. 
नव नीले आसमां पर,
झूलते इन्द्रधनुष पे
प्राणपिया के अंगना
सप्तऋषि के द्वार
. 
उतर रहा वह नभ पर
सातवें आसमान से
सवार सात घोड़ों पर
करता हुआ सब पार
. 
प्रकाशित हुआ  जहां
अलौकिक , आनंदित
खिल उठा तन बदन
वो आशियाना दीप्त
. 
थिरक रही अम्बर में
अरुण की ये रश्मियाँ,
चमकी धूप सुनहरी सी
रोशन हुआ घर बाहर 
 . 
निभाने वो सात वचन
आई  पिया के द्वार 

रेखा जोशी 


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