Wednesday, 14 September 2016

हिंदी गरीब भाषा

विरिष्ठ लेखक सरदार खुशवंत सिंह के अनुसार ”हिन्दी एक गरीब भाषा है ”| सही ही तो कहा है उन्होंने,हिंदी सचमुच गरीबों की ही भाषा है,यह सोच कर सुधीर बहुत दुखी था ,सरकारी स्कूल और सरकारी कालेज से शिक्षा प्राप्त करने के बाद सुधीर ने कई कम्पनियों में इंटरव्यू दिए पर असफलता ही हाथ लगी ,ऐसा नही था की वह बुद्धिमान नही था ,याँ वह वह होनहार नही था ,वह बहुत प्रतिभाशाली था लेकिन अंग्रेज़ी भाषा को ले कर उसका आत्मविश्वास बुरी तरह से आहत हो चुका था ,डगमगा चुका था ,हिंदी भाषी संस्थानों से पढाई करने के बाद जब उसने बाहरी दुनिया में कदम रखा तो अंग्रेजी भाषा में संवाद स्थापित करने में असमर्थ सुधीर हीन भावना का शिकार होने लगा|

 सुधीर ही क्यों हमारे देश में आधी से ज्यादा जनसंख्या हिंदी भाषी है एवं हिंदी भाषी विद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करती है और वह सभी लोग अंगेजी बोलने वालो के सामने अपने को तुच्छ और हीन समझने लगते है वह इसलिए क्योंकि हिंदी भाषा को हेय दृष्टि से देखा जाता है ,हिंदी के प्रति यह सौतेला व्यवहार ,आखिर क्यों ,जो हिंदी बोलते है उन्हें क्यों गंवार समझा जाता है और जो अंग्रेजी में प्रतिभाशाली करते है उन्हें इज्ज़त से देखा जाता है जबकि हिंदी हमारे भारत की राज भाषा है हमारी अपनी मातृ भाषा है ,परन्तु आज हिंदी गरीबों और अनपढ़ों की भाषा बनकर रह गई है ,केवल अंग्रेजी ही पढ़े लिखों की भाषा मानी जाती है | 

इन सारी बातों ने सुधीर को झकझोर कर रख दिया था ,आज़ादी मिलने के छ्यासठ वर्ष बाद भी हम आज तक अंग्रेजी के गुलाम बने हुए है ,कब तक सुधीर जैसे अनेक नौजवान अपने ही देश हिन्दुस्तान में हिंदी की वजह से पिछड़े हुए कहलाते रहें गे | यह इस देश का दुर्भाग्य है कि किसी सरकारी स्कूल के विद्यार्थी और पब्लिक ,प्राइवेट और अन्य अंग्रेजी भाषी स्कूल के विद्यार्थी का एक जैसा पाठ्यक्रम होने पर भी हिंदी भाषी सरकारी स्कूल के छात्र अंग्रेजी भाषी स्कूल के छात्रों से सदा पिछड़े हुए रहते है ,इसी कारण अब मध्यमवर्गीय परिवार के लोग तो क्या निर्धन परिवारों के लोग भी अंग्रेज़ी भाषी स्कूलों में अपने बच्चो को शिक्षित करना चाहते है ,चाहे उन्हें उसके लिए अपना पेट काट कर क्यों न रहना पड़े | हमारे भारत की तीन चौथाई जनसंख्या गाँवों में रहती है जहां या तो स्कूल न के बराबर होते है अगर है तो सिर्फ हिंदी भाषी जिनका अंग्रेजी भाषा से दूर दूर तक कोई सरोकार नही होता ,ऐसे में आज के नौजवान, युवा वर्ग इस देश की भविष्य नीधि जब अंग्रेज़ी भाषा के सामने हीन भावना से ग्रस्त रहेगी तो इस देश के भविष्य का क्या होगा ?

रेखा जोशी