Saturday, 4 February 2017

मुक्तक

उड़ायें गे पतंग लिये हाथ में डोर
मुस्कुराया बसन्त गली गली में शोर
उड़ें गी उमंगे  छू लेंगी आसमान 
लहरायें गगन में चले न कोई ज़ोर
,
गुलाबों  का  मौसम आया बगिया में बहार 
है  कुहकती कोयलिया  अब अंबुआ की डार 
हर्षौल्लास  से  थिरकते झूम रहे आज सब 
है  मदमस्त चल रही यहाँ फागुन की बयार 

रेखा जोशी