Wednesday, 8 February 2017

कवि रामधारी सिहं दिनकर

कहते है "जहाँ न पहुचे रवि , वहाँ पहुंचे कवि "अर्थात कवि की असीम कल्पना शक्ति  सूर्य की किरणों से भी प्रखर होती है ,कवि द्वारा रची गई रचना एक क्रांति को जन्म दे सकती है ,एक आंदोलन पैदा कर सकती है ,जन जन में जोश भर सकती है।ऐसे ही एक जनकवि का जन्म 23 सितम्बर 1908 में बिहार राज्य के बेगूसराय जिले के सिमरिया गाँव में हुआ था "नाम था रामधारी सिंह दिनकर"।

दिनकर जी की कविताएं  जोश और ओज से परिपूर्ण है ,भले ही समय बदल गया है लेकिन वह आज भी उतनी प्रासंगिक है जितनी कि वह पहले थी,उनकी कविताएं सामाजिक परिस्थितियों पर लिखी गई है ,उनकी प्रसिद्ध रचनाएं,उर्वशी,कुरुक्षेत्र,रेणुका,,रश्मिरथी,द्वन्दगीत,बापू ,धूप छाँव,मिर्च का मज़ा ,सूरज का ब्याह,आदि है। 1972 में उन्हें उर्वशी के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया ,अपने जीवन काल में उन्होंने अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया । जहां उन्हें राष्ट्रकवि का दर्जा मिला था वहीं वह जनकवि भी थे ,चाहे अनपढ़ हो या पढा लिखा उनकी कविताएं हर किसी को भाति थी। दिनकर जी की  कविताओं की एक खास विशेषता थी ,अनुभूति एवं  अभिव्यक्ति की तीव्रता ।
24 अप्रैल 1974  हमने उस अनमोल रत्न को खो दिया ।
 
उनकी लिखी हुई कुछ पंक्तिया "कुरुक्षेत्र" से

“निभाना पार्थ-वध का चाहता था राधेय प्रण.

द्रुपद था चाहता गुरु द्रोण से निज वैर का शोधन.

शकुनि को चाह थी, कैसे चुकाए ऋण पिता का,

मिला दे किस भांति धूल में किस भांति कुरु-कुल की पताका.

सुयोधन पर न उसका प्रेम था, वह घोर छल था.

हितु बनकर रखना ज्वलित केवल अनल था.

जहाँ भी आग थी जैसी, सुलगती जा रही थी

समर में फूट पड़ने के लिए अकुला रही ठी.

सुधारों से स्वयं भगवान के जो-जो चिढ़े थे,

नृपति वे क्रुद्ध होकर एक डाल में जा मिले थे

नहीं शिशुपाल के वध से मिटा था मान उनका.

दुबककर रहा था धुंधुँआ द्विगुण अभिमान उनका.”

"अगले छंद में उन्होंने  युधिष्ठिर को भी कठघरे में खड़ा कर दिया "

जब युद्ध में फुट पड़ी थी आग,

तो कौन सा पाप नहीं किया तूने?

गुरु के वध के हित झूठ कहा,

सर समाधि में ही काट लिया तूने;

छल से कुरुराज की जांघ तोड़,

नया रण-धर्म चला दिया तूने;

अरे पापी, मुमूर्षु मनुष्य के वक्ष को ,

चीर सहास लहू पिया तूने !

रेखा जोशी