Saturday, 20 February 2016

जिन खोज तीन पाया [मेरी पूर्व प्रकाशित रचना ]

मंदिर से निकलते ही पास वाले पार्क में लोगों की भीड़ देखी तो वहीँ रुक गई ,उत्सुकता वश मै भी भीड़ का एक हिस्सा बन कर वहां खड़ी हो गयी ,तभी चमत्कारी बाबा की जय ,चमत्कारी बाबा की जय के नारे हवा में गूंजने लगे | भगवा चोला पहने , आधा चेहरा दाढ़ी में छुपाये एक आदमी तरह तरह के जादुई करिश्में कर के लोगों को दिखा रहा था |कभी अपने हाथों में फूल ले आता तो कभी तलवार निकाल लाता,कभी उसके मुहं पर खून सा लाल रंग आ जाता तो कभी उसके हाथ लाल हो जाते| लोग अभी भी उसकी जय जयकार कर रहे थे ,भीड़ में से कुछ लोग निकल कर उस पाखंडी बाबा के पैर छू रहे थे |

मै सोचने पर मजबूर हो गयी ,कैसे एक आदमी,हाथों की सफाई से और छोटे मोटे वैज्ञानिक प्रयोगों दुवारा भोले भालेलोगों को बेवकूफ बना रहा है |तभी शुरू हो गया समस्याए सुलझाने का सिलसिला |.भीड़ में से एक औरत उठी ,बाबा के पैर छू कर अपने बेटे के केरियर के बारे में पूछने लगी |बाबा तो जैसे अन्तर्यामी हो झटपट कई उपाय बता दिए ,उसके बाद तो प्रश्नों की झड़ी सी लग गई जिसका समाधान बाबा ने चुटकियों में कर दिया |बस बहुतहो गया था ,अब एक क्षण भी रुकना मेरे लिए नागवार था ,यह पाखंडी बाबा कैसे लोगों को मूर्ख पे मूर्ख बनाये जा रहा है ,और क्यों यह लोग आँखे मूंदे उस की बातों पर विश्वास किये जा रहें है |इस धरती पर कैसे कैसे लोग रहते है ?

मै भीड़ से निकल कर बाहर को आ गई और घर की तरफ चल पड़ी ,रास्ते में सोचने लगी ,इतना विशाल और विराट, ब्रह्मांड उसमें हमारी यह धरती और उसपर रहने वाले हम सब प्राणी ,इस पूरी सृष्टि में हमारी हस्ती ही क्या है ? भानुदेव से बंधी , अपनी अपनी कक्षाओं में बाकी ग्रहों सहित यह धरा सदियों से परिक्रमा करती आ रही है और आगे भी करती रहे गी| चाँद पर कदम रखने के बाद ,दुनिया भर के वैज्ञानिक सितारों से आगे विस्तृत अन्तरिक्ष के विभिन्न पिंडों की खोज में लगे हुए है और इस धरती पर भारतवासी अन्धविश्वासो में घिरे हुए है

अचानक लाउडस्पीकर की ऊँची आवाज़ मेरे कानो में पड़ी ,देखा तो सड़क के किनारे एक पंडाल के बाहर कुछ लोग खड़े थे और पंडाल के अंदर कोई भजन गा रहा था ,”मुझमें राम तुझमें राम सबमें राम समाया ”भजन खत्म होते ही ,किसी आदमी की आवाज़ कानों में पड़ी ,”स्वामी जी जब सब के अंदर एक ही ईश्वर का अंश है तो कोई चोर ,डाकू तो कोई अमीर या गरीब क्यों होता है?मेरे कान चौकन्ने हो कर उन की बाते सुनने लगे,”बेटा ,यह सब कर्मों का खेल है ,हमारे अंदर की आवाज़ हमे बताती है ,सही और गलत के बारे में ,उसे सुना अनसुना करके हम जैसा कर्म करते है वही हमारी पहचान बन जाती है |”एक ठहरी हुई आवाज़ मेरे कानो में आई,”अगर हम कोई अच्छा कर्म करते है ,तो हमे अंदर से और अच्छा कर्म करने की प्रेरणा मिलती है उसी ऊर्जा से हम कुछ और बदिया कर्म करना चाहें गे |”

यह सुनते ही मेरी बुद्धि  के बंद दरवाज़े खुलने लगे ,पदार्थ का सूक्ष्मतर कण जिसे इलेक्ट्रोन कहते है जिसे बाँधा हुआ है अणु की नाभि ने ,वो अपनी कक्षा में नाभि के चारों ओर परिक्रमा करता रहता है| बाहर से उर्जा मिलने पर वह अपनी कक्षा छोड़ उपर की कक्षा में चला जाता है ,अधिक उर्जा मिलने पर वह एक एक कर के सारी कक्षाए पार करता हुआ मुक्त हो जाता है ,ठीक वैसे ही जब हम कोई अच्छा कर्म करते है ,हमे उर्जा मिलती है कुछ और अच्छा कर्म करने की और हम भी एक एक कर के विभिन्न कक्षाओं को पार करते हुए अंत में बंधन मुक्त हो जाते है| गीता में भी श्री कृष्ण ने हमे कर्म का ही सन्देश दिया है | गीता के इस श्लोक को याद करते हुए मै अपने घर पहुंच चुकी थी | ”कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन |मा कर्मफलहेतुभुर्मा ते संड्गो-स्त्वकर्मणि ||”

रेखा जोशी