Saturday, 11 July 2015

परछाई तेरी

यूँही सदियों से
चल रही पीछे पीछे
बन परछाई तेरी
अर्धांगिनी हूँ मै तुम्हारी
पर क्या
समझा है तुमने
बन पाई मै कभी
आधा हिस्सा तुम्हारा
बहुत सहन कर चुकी
अब मत बांधो मुझे
मत करो मजबूर
इतना कि तोड़ दूँ
सब बंधन
मत कहना फिर तुम
विद्रोही हूँ मै
नही समझे तुम
मै तो बस अपना
हक़ मांग रही हूँ
तुम्हारी
अर्धांगिनी होने का

रेखा जोशी