Thursday, 2 July 2015

रुकता नही वक्त कभी

रुकता नही वक्त कभी
चलती है ज़िंदगी संग इसके
तुम अकेले क्यों खड़े
रुके क्यों हो तुम
रुकता नही सूरज
और न ही रुकते
चाँद सितारे
फिर तुम किसका
कर रहे इंतज़ार
रुकना है मृत्यु
उठो चलो समझो तुम
अपने होने का अस्तित्व
बह जाओ संग धारा के
तुम में है वो फन
खिला सकते हो तुम
फूल ही फूल राहों में
महका सकते हो तुम
वन उपवन

रेखा जोशी