Sunday, 7 December 2014

तुम में है वो फन

होता दुःख कैद  देख तुम्हे
दीवारों में
जो बना रखी खुद तुमने
अपने ही हाथों
खुद को किया  कैद
क्यों पिंजरे में
मुहँ छिपाये पँख लपेटे
कब तक बुनोगे जाल 
अपने इर्द गिर्द
तोड़  अब बंधन सब
भर लो उड़ान
फैला कर अपने पँख
उन्मुक्त ऊपर दूर गगन  में
है विश्वास तुम्हे खुद पर
जानते हो  तुम में है वो फन 
मंज़िल तुम्हारी है उड़ान  
कर अपना इरादा पक्का
फैला कर अपने पँख 
निकल पड़ो फिर से
ज़िंदगी की इक
लम्बी उड़ान भरने

रेखा जोशी