Sunday, 7 June 2015

कांपते थे हाथ पढ़ते हुए खत तेरे

क्या ज़माना था वह 
जब जुड़े थे हमारे दिल के तार 
न कोई फोन था तब 
न कोई और साधन 
धड़कते दिल को तब 
रहता था इंतज़ार तेरे खत का 
हर शाम आँखे 
टिक जाती  दरवाज़े पर 
जब तुम दूर थे हमसे 
सीमा पर 
तेरी चिट्ठी भी तो महीनों 
इंतज़ार करवाती थी तब 
कांपते थे हाथ पढ़ते हुए खत तेरे 
और सजल नैनो से  मेरे 
बह जाते थे जज़्बात 
अश्रुधारा बन  पाती पर 
है आज भी सहेजे हुए 
वो जज़्बात उमड़ आते जो फिर से 
जब भी पढ़ती हूँ मै तेरे वह खत 

रेखा जोशी