Thursday, 25 June 2015

उतर आता सतरंगी आसमाँ

अक्सर
देखती हूँ ख़्वाब 
है लगता अच्छा 
लगा कर सुनहरे पँख
जब उड़ता अंबर में
मेरा मन और फिर 
उतर आता सतरंगी आसमाँ 
ख्वाबों में मेरे
होता झंकृत मेरा मन 
छिड़ जाते तार इंद्रधनुष के
और फिर बज उठता
अनुपम संगीत 
थिरकने लगता मेरा मन
और फिर होता सृजन मेरी 
रंग बिरंगी कल्पनाओं का
उतरती कागज़ पर
शब्दों से सजी कविता
गुनगुनाते लब मेरे
और फिर 
मुस्कुराती है ज़िंदगी
खिलखिलाती है ज़िंदगी 

रेखा जोशी