Tuesday, 7 October 2014

अपनापन [लघु कथा ]

सूअर के बच्चे ,कितना बड़ा पेट है तुम्हारा ,अभी अभी तो खाना खाया था तुमने ,फिर से भूख लग गई तुम्हे ,पेट है याँ कुँआ , कभी भरता ही नही और यह क्या ,कितना गंद फैला रखा है तुमने पूरे घर में ,कौन साफ़ करेगा इसे , मै क्या सारा दिन घर में बस पोछा ही लगाती रहूँ गी ,और कोई कामधाम नही करना है मुझे,जब देखो भूख ही लगी रहती है |”एक ही सांस में सुमि ने अपने बेटे आदि को न जाने क्या क्या सुना दिया | आँखों में आँसू लिए डरते डरते आदि ने फिर से एक बार हिम्मत करके कहा ,”माँ सच में बहुत भूख लगी है ,कुछ खाने को दे दो न |” आदि की ओर देखते ही सुमि का गुस्सा तो बस सातवें आसमान पर पहुंच गया ,उसने आव देखा न ताव ,गुस्से में अपने दांत भीचते हुए, ,झूट से अपने पैर से चप्पल उतारी ओर आदि को जोर से दो चार लगा दी और वह बेचारा रोता हुआ सोफे के एक कोने में दुबक कर बैठ गया | ट्रिन ट्रिन ट्रिन तभी दरवाज़े की घंटी जोर से बज उठी ,सुमि ने दरवाज़ा खोला तो सामने उसकी सखी मीता खड़ी थी | मीता को देखते ही सुमि के चेहरे के भाव बदल गए ,बड़े प्यार से उसने मीता को सोफे पर बिठाया और वहाँ कोने में बैठे आदि की तरफ देख कर वह पुचकारते हुए आदि से बोली ,”अरे अरे मेरे प्यारे बेटे को भूख लगी है बताओ बच्चे तुम क्या खाओ गे ,मैगी बनाऊँ याँ सैंडविच खाओगे ,जो मेरा राजा बेटा खायेगा मै अपने बेटे के लिए वही बनाती हूँ ‘यह कहते हुए सुमि रसोईघर में चलने को हुई | उसके पीछे पीछे उसकी सहेली मीता भी चल दी ,”सुमि तुमने पराये बच्चे को कितनी जल्दी अपना लिया है ,सौतेला बेटा होते हुए भी तुम्हारे प्यार में कितना अपनापन है |”
रेखा जोशी