Saturday, 18 April 2015

सतरंगी आसमाँ


ढलती साँझ
उदास सी चुपचाप
सुनती रही
सागर की लहरों का शोर
तोड़ती रही वह मौन
सागर तट का
सुरमई शाम सिहर उठी
लहरों की गर्जना से
और सूरज धीरे धीरे
छूने लगा
आँचल सुनहरी लहरों का
नाचती थिरकती झूम उठी
लहरें पाकर
लालिमा सूरज की
खामोश शाम भी
चहक उठी देख
सतरंगी आसमाँ

रेखा जोशी