Sunday, 17 May 2015

धरतीपुत्र की व्यथा

धरतीपुत्र की व्यथा 

आसमान में उमड़ते घुमड़ते काले काले बादल देख कर और झमाझम बारिश से जहाँ किसानो के दिल बल्लियों उछलने लगते थे वहीँ बेमौसम की लगातार बरसात और पथरीले ओलों ने आज उनकी अनथक मेहनत पर पानी फेर दिया। आजमगढ़ के कुरियांवा गांव निवासी गुलाबी और उसके पति रामकुमार ने गेहूं काटकर रखा  था। खराब मौसम के चलते वह जल्द से जल्द मड़ाई करने के लिए परेशान थे कि  इसी बीच तेज़ बारिश से उनकी पूरी की पूरी फसल पानी में डूब गई। इस सदमे को बेचारा रामकुमार सह न सका और उसी रात हृदयगति रुक जाने से उसकी मौत हो गई । 

सवेरे से ही रामकुमार की दोनों बेटियों रधिया और उसकी छोटी बहन रमिया ने अपने आप को पीछे की छोटी कोठरी में बंद कर लिया tरामकुमार की पत्नी गुलाबी  का तो रो रो कर बुरा हाल हो गया ,उधर रामकुमार के पिता रामधन के दिल का हाल शायद ही कोई समझ पाता,उपर से पत्थर बने बुत की भांति अपना सर हाथों में थामे ,घर के बाहर एक टूटी सी चारपाई पर वह निर्जीव सा पड़ा हुआ था ,लेकिन उसके भीतर सीने में जहाँ दिल धडकता रहता है ,उसमे एक ज़ोरदार तूफ़ान ,एक ऐसी सुनामी आ चुकी थी जिसमें उसे अपना  घर बाहर सब कुछ बहता दिखाई दे रहा था ,''कोई उसे क्यों नही समझने की कोशिश करता,बेटे की मौत का सदमा उसकी बर्दाश्त से बाहर था , पता नही उसकी किस्मत में क्या लिखा था परन्तु वह कर भी क्या सकता ,उसका इकलौता बेटा उसे सदा के लिए छोड़ कर चला गया और  उसके खेतों ने भी उसका साथ छोड़  दिया ,फसल बर्बाद हो गई ,लेकिन उसके सर पर सवार क़र्ज़ की मोटी रकम को वह कैसे चुकता कर पायेगा  ,उपर से भुखमरी ,घर गृहस्थी का बोझ एक बार तो उसके दिल में आया कि क्यों न जग्गू की तरह वह भी नहर में कूद कर अपनी जान दे दे ,लेकिन अपनी बहू गुलाबी ,पोतियाँ रधिया  और रमिया कि खातिर वह ऐसा भी तो नही कर सकता ,जग्गू के परिवार की  उसके मरने के बाद हुई दुर्गति से वह भली भाँती  परिचित था ''|आज रामधन अपने आप को बहुत असहाय ,बेबस और निर्बल महसूस कर रहा था ।

प्रकृति की इस मार से देश भर के किसानों पर कहर टूट पड़ा है। खेतों में बर्बाद फसल देख  मरने वालों का सिलसिला थम ही नहीं रहा ,किसानो की व्यथा का कोई पारावार नहीं है ,आजमगढ़ का रामकुमार हो या  बलिया का राधेश्याम , गाजीपुर का हरिभाई हो या जौनपुर का इंद्रजीत,पंजाब ,हरियाणा हो या पूर्वांचल भारत के हर गाँव में  एक-एक करके  किसान दम तोड़ रहे है ,गरीबी रेखा के नीचे रहते कई किसान भाई ,जिनका जीवन सदा उनके खेत और उसमे लहलहाती फसलों के इर्द गिर्द ही घूमता रहता था ,आज उनके घर के चूल्हे ठंडे पड़  चुके है ,गाँव के गाँव  शोक में पूरी तरह डूबे  हुए है । अपनी  फसल की बर्बादी का दंश कई किसान नहीं झेल पा रहे और हृदयाघात के चलते वह इस दुनिया से कूच कर रहे है और कई किसान भारी क़र्ज़ के कारण खुद अपने ही हाथों अपनी ज़िंदगी ख़त्म करने पर मजबूर हो रहे है । 

कभी सोने की चिड़िया कहलाने वाला  हमारा भारत देश , जिसकी  सोंधी सी महक लिए माटी में सदा लहलहाते रहे है ,हरे भरे खेत खलिहान,किसानो के इस देश में ,उनके साथ  आज क्या हो रहा है ?  उनके सुलगते दिलों से निकलती चीखे कोई क्यों नही सुन पा रहा ,संवेदनहीन हो चुके है लोग यां सबकी अंतरात्मा मर चुकी है ,इस देश को चलाने वाले भी शायद बहरे  हो चुके है ,भारत के धरतीपुत्र अपनी अनथक मेहनत से दूसरों के पेट तो भरते आ रहें है ,लेकिन वह आज अपनी  ही जिंदगी का बोझ स्वयम नही ढो पा रहे और अब हालात यह हो गए है की वह आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहें है। 

धरती से सोना उगाता
धरतीपुत्र कहलाता
भर कर पेट सबका
खुद भूखा सो जाता
फिर भी नहीं घबराता
देख फसल खड़ी खलिहान में
मन ही मन हर्षाता
लेकिन नही सह पाता
प्रकृति और क़र्ज़ की मार 
मन ही मन टूट जाता 
कभी झमाझम बारिश
कभी सूखे से दुखी लाचार 
आखिर
थक हार कर जीवन से
असहाय वह छोड़ कर
सबका साथ
थाम लेता अंत में 
मौत का हाथ

रेखा जोशी