Thursday, 28 May 2015

खड़ा फिर भी ठूठ अब माली की नज़र भी उठ चुकी

सूख  गये  पत्ते  अब  डाली  डाली  भी  सूख  चुकी 
खड़ा फिर भी ठूठ अब  माली की नज़र भी उठ चुकी 
लहराती  थी  डाली   जहां   कभी   खिलते  थे  फूल  
निष्फल  जीवन जीने  की यहाँ  आस भी टूट  चुकी 

रेखा जोशी